रजनीश से ‘ओशो’ रजनीश बनने की कहानी : उन्ही की जुबानी

मैंने ओशो का केवल नाम ही सुना था! ढेर सारे बाबाओं की लिस्ट में से उन्हें भी एक ही मानता था! कई बार उन्हें पढ़ने का मौका भी मिला, मगर मैंने उन्हें नहीं पढ़ा! कारण था बाबाओं को लेकर मेरे मन का पूर्वाग्रह! मगर जब एक बार उन्हें सुना, तो यह धारणा टूट गयी! जिन्होंने ओशो को पढ़ा या सुना है, उनमें से कई लोगों के मन में सवाल आया होगा कि आखिर इस ईश्वर विरोधी शख्स ने बाबाओं जैसे इस भेष को क्यों चुना? क्यों खुद को भगवान घोषित कर लिया? इस सवाल का जवाब अगर आप उन्हीं के शब्दों में सुनेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा! इसलिए प्रस्तुत है ओशो रजनीश द्वारा 12 जनवरी, 1985 को दिए गए भाषण के अंश!
ओशो रजनीश जवानी में यूनिवर्सिटी में मैं नास्तिक और अधार्मिक व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। प्रत्येक आचार व्यवस्था के खिलाफ था और आज भी यह बरक़रार है। इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटा। पर नास्तिक, अधार्मिक और प्रत्येक आचार व्यवस्था विरोधी पहचान मेरे लिए एक समस्या बन गयी। लोगों के साथ किसी तरह का संचार मुश्किल था। लोगों के साथ किसी तरह का संपर्क स्थापित करना लगभग असंभव था। जब लोगों को पता चलता कि मैं नास्तिक हूँ, अधार्मिक हूँ और आचार व्यवस्था का विरोधी हूँ तो वे सारे दरवाजे बंद कर लेते। मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता, किसी स्वर्ग-नरक में विश्वास नहीं करता। लोगोँ के लिए यह विचार ही मुझसे दूर भागने के लिए काफी था। मैं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था इसलिए सैकड़ों प्रोफेसर, शोध छात्र मुझसे कतराते थे क्योंकि वे जिस चीज में विश्वास रखते थे उसे कहने का उनमें हौसला नहीं था। अपने विचारों के लिए उनके पास कोई तर्क नहीं था।
विश्वविद्यालय की सड़कों के नुक्कड़ों पर, पान की दुकानों पर, जहाँ भी कोई मिलता, वहीँ तर्क करता रहता था। मैं धर्म पर सीधी चोट करता था, लोगों को इस बकवास से पूरी तरह छुटकारा दिलाने की पूरी कोशिश करता था। इसका परिणाम यह निकला कि मैं एक द्वीप बनकर रह गया। कोई मुझसे बात करके राजी नहीं था। उन्हें डर था कि यदि उन्होंने मुझे बुलाया तो पता नहीं मैं उनको कहाँ ले जाऊँ। आख़िरकार मुझे अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।
मैं सचेत हुआ कि जो लोग सत्य की खोज के इच्छुक हैं वे आश्चर्य की सीमा तक धर्म से जुड़े हैं। अधार्मिक समझा जाने के कारण मैं उनसे विचार विमर्श नहीं कर सकता था। यही लोग सत्य की खोज के इच्छुक थे। यही लोग थे जो मेरे साथ अनजानी राहों पर चल सकते थे। पर ये लोग पहले ही किसी धर्म सम्प्रदाय या दर्शन से जुड़े थे। उनका मुझे अधार्मिक सोंचना ही बाधा बन गया। इन्हीं लोगों की मुझे जरुरत थी।
वे लोग भी थे जो धर्म में लीन नहीं थे, पर उनमें सत्य की खोज की जिज्ञासा नहीं थी। यदि उन्हें प्रधानमन्त्री पद और सत्य में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाता तो वे प्रधानमंत्री पद को प्राथमिकता देते। सत्य के बारे में वे कहते, “कोई जल्दी नहीं। यह तो कभी भी किया जा सकता है। प्रधानमंत्री पद फिर शायद कभी न मिले। सत्य तो हर किसी का स्वभाव है, इसे कभी भी प्राप्त किया जा सकता है। सबसे पहले वह करना चाहिए जो क्षणिक है, समयबद्ध है और जिसका समय हाथ से निकल रहा है। ऐसा सुहाना सपना शायद फिर न आये। सत्य तो कहीं भागा नहीं जाता।”
उनका रुझान सपने, कल्पना की ओर था। उनकी और मेरी बातचीत असंभव थी क्योंकि मेरे और उनके हित अलग अलग थे। मैंने पूरी कोशिश की पर इन लोगों की धर्म में, सत्य में और अन्य किसी महत्वपूर्ण बात में रूचि नहीं थी। जिनकी रूचि थी वे ईसाई थे, या हिन्दू, मुसलमान, जैन या बौद्ध थे। वे पहले ही किसी धर्म या विचारधारा से जुड़े थे। अब मुझे स्पष्ट हो गया था कि मुझे धार्मिक होने का नाटक करना पड़ेगा। कोई और रास्ता भी नहीं था। इसके बाद ही मुझे असली खोजी मिल सकते थे।
मैं धर्म शब्द से ही नफ़रत करता था। मैंने सदा इससे नफरत की है। पर मुझे धर्म पर बोलना पड़ा। धर्म की आड़ में जो बातें कहीं असल में वो वह नहीं था जो लोग समझते थे। वह सिर्फ रणनीति थी। उनके शब्द ईश्वर, धर्म और मुक्ति का मैं प्रयोग कर रहा था पर उन्हें अपने अर्थ दे रहा था। इस तरह मैंने लोगों को ढूँढना शुरू किया, वे मेरे पास आने लगे।
लोगों की नजरों में अपनी छवि सुधारने में कई वर्ष लगे। लोग शब्द तो सुनते थे पर उनके अर्थ नहीं समझते थे। लोग वही समझते हैं जो तुम कहते हो। जो कुछ अनकहा रह जाता, वो उसे नहीं समझते थे। इसलिए मैंने उनके हथियार को ही उनके ख़िलाफ़ प्रयोग किया। मैंने धर्मग्रंथों पर टिप्पणी की मगर उन्हें अपने अर्थ दिए। वह चीजें मैं बिना टिप्पणी के भी कह सकता था, वह मेरे लिए आसान थी, क्योंकि तब मैं सीधा तुमसे बात कर रहा होता। फिर कृष्ण, महावीर और ईसा को बीच में घसीटने की कोई जरुरत नहीं थी, वह सब भी कहने की जरुरत नहीं थी, जो उन्होंने कभी नहीं कहा। यह मानवता की मूर्खता है कि वहज बातें जो मैं पहले कहता रहता था, जिन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं था, अब क्योंकि मैं कृष्ण बोल रहा था इसलिए हजारों लोग मेरे आस पास इकट्ठे होने लगे।
यही एकमात्र तरीका है। जब मैंने ईसा पर बोलना शुरू किया तो ईसाई कॉलेजों और ईसाई धार्मिक संस्थाओं नें मुझे बोलने के लिए बुलाना शुरू किया, मैं मन ही मन हमेशा हँसता रहता। क्योंकि मूर्ख समझते हैं कि यह ईसा ने कहा है। हाँ, मैंने ईसा के शब्द प्रयोग किये हैं। किसी के शब्दों के खेल को समझने की जरुरत है, फिर किसी भी शब्द को कोई भी अर्थ दिया जा सकता है। वे सोंचते हैं कि यही ईसा का वास्तविक सन्देश है। वे कहते हैं कि ईसाई मिशनरियों और पादरियों ने ईशा के लिए इतना नहीं किया जितना आपने किया है।
मैं चुप रहता। मैं जानता था मुझे ईसा से कुछ नहीं लेना। जो कुछ मैं कह रहा था, ईसा तो उसे समझ भी नहीं सकता। वह बेचारा तो बिलकुल अनपढ़ व्यक्ति था। इसमें कोई शक नहीं कि उसका व्यक्तित्व चुम्बकीय है। उसके लिए अनपढ़ और स्वर्ग के लोभियों को इकठ्ठा करना मुश्किल काम नहीं था। यह आदमी वादे करता था और इसके बदले में माँगता कुछ नहीं था। फिर उसमें विश्वास करने में क्या हर्ज है? कोई खतरा नहीं, कोई जोख़िम नहीं। यही कोई ईश्वर नहीं, स्वर्ग नहीं, तो तुमने कुछ नहीं खोया। यदि ये कहीं हों तो मुफ़्त लाभ ही लाभ। बहुत आसान हिसाब किताब है। यह आदमी कुछ नहीं जनता। उसके पास कोई तर्क नहीं है। वह उन्हीं चीजों को दोहराता है जो उसने दुनिया से सुनी हैं। परन्तु वह कट्टर किस्म का अड़ियल नौजवान था। जो कुछ मैं ईसा के नाम पर कहता था, वह पहले भी कह रहा था। पर तब किसी ईसाई कॉलेज या धार्मिक संस्थाओं नें मुझे नहीं बुलाया। बुलाना तो दूर, अगर मैं जाने की कोशिश भी करता तो दरवाजे बंद कर लेते। यह स्थिति थी। मुझे मेरे अपने शहर के बीच स्थित मंदिर में जाने से रोका गया… पुलिस की सहायता से। पर अब उसी मंदिर वालों नें मुझे बुलाना शुरू किया।
मैंने अपने ढ़ंग तरीके निकाले। मैं ईश्वर पर बात करता और कहता कि ईश्वर तो बहुत अच्छा शब्द है। मैं ईश्वरता पर बोल रहा था इसलिए पुजारियों से ठगे गए सत्य के पथिकों नें मुझमें रुचि लेनी शुरू कर दी। मैंने सभी धर्मों का सार इकठ्ठा कर लिया। मैंने रास्ता ढूँढ लिया। मैंने सिर्फ यह सोंचा, “उनके शब्दों का इस्तेमाल करो, उनकी धार्मिक पुस्तकें इस्तेमाल करो। यदि तुम किसी और की बन्दूक चला रहे हो तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम अपनी गोलियाँ नहीं प्रयोग कर सकते। बन्दूक किसी की भी हो, गोलियाँ मेरी ही हैं। असली काम तो गोलियों को ही करना है, फिर क्या हर्ज है? यह बहुत आसान काम था। मैं हिन्दू शब्दों का इस्तेमाल करके वही खेल खेल सकता था, मुसलमानी शब्द प्रयोग करके यही खेल खेल सकता था, ईसाई शब्दावली प्रयोग करके खेल खेल सकता था।”
मेरे पास सिर्फ यही लोग नहीं आये बल्कि जैन, साधु, साध्वियाँ, हिन्दू और बौद्ध साधू, ईसाई मिशनरी और पादरी हर किस्म के लोग मेरे पास आये। तुम यकीन नहीं करोगे, तुमने मुझे कभी हँसता हुआ नहीं देखा होगा। अंदर ही अंदर मैं इतना हँसा हूँ कि अब मुझे हंसने की जरुरत ही नहीं पड़ती। मैं तुम्हें सारी उम्र लतीफ़े सुनाता रहा हूँ पर मैं नहीं हँसता क्योंकि मैं तो सारी उम्र मजाक ही करता रहा हूँ। इससे अधिक मजाक की बात क्या हो सकती है कि मैं सारे पादरियों और महान विद्वानों को इतनी आसानी से बुद्धू बनाने में कामयाब हुआ। वे मेरे पास सवाल लेकर आने लगे। शुरू शुरू में मुझे उनके शब्द सावधानी से बोलने पड़ते। मैं शब्दों और पंक्तियों में अपने विचार चला देता, जिनमें मेरी रूचि होती।
शुरू शुरू में लोगों को धक्का सा लगा। वे लोग, जो जानते थे कि मैं नास्तिक हूँ, असमंजस में पड़ गए। स्कूल का मेरा एक मास्टर कहता है, “क्या हो गया? क्या तू बदल गया?” और उसने मेरे पैर छुए। मैंने कहा, “पैरों को हाथ मत लगाओ। मैं नहीं बदला और मरते डैम तक नहीं बदलूँगा।” ऐसा कई बार हुआ। एकबार मैं जबलपुर मुस्लिम संस्था में बोल रहा था। मेरा मुसलमान टीचर वहाँ प्रिंसिपल था। जब मेरे टीचर ने मुझे देखा तो कहने लगे, “मैंने मुअजजे  होते सुने हैं पर यह तो अचानक मुअजजा है। तू सूफ़ीवाद और इस्लाम की आधारभूत फिलॉसफी पर बोल रहा है?” मैंने कहा, “मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा, आप मेरे पुराने टीचर हो। मैं तो अपने दर्शन पर ही बोलूँगा। हाँ कभी कभार इस्लामी शब्द चलाऊँगा, बस…।” …. अब मैंने अपने लोगों का चुनाव किया। सारे भारत में मैंने अपने ग्रुप बनाने शुरू किये।अब मेरे लिए सिख मत, हिंदू या जैन मत पर बोलना अनावश्यक था। पर लगातार दस वर्ष मैं इनपर बोलता रहा। धीरे धीरे जब मेरे अपने लोग हो गए तो मैंने बोलना बंद कर दिया। बीस साल सफ़र में रहकर मैंने सफ़र करना बन्द कर दिया। क्योंकि अब जरुरत ही नहीं थी। अब मेरे अपने लोग थे। दुसरे आना चाहते तो मेरे पास आ सकते थे। …कई साल सन्यास देने के बाद काम छोड़ दिया, तीन साल के लिए। एक अंतराल जिसमें कोई जाना चाहे तो जा सकता था। क्योंकि मैं किसी की जिंदगी में दखल नहीं देना चाहता था।
(रजनीश बाइबिल, वोल्यूम 3, पृष्ट 438 से 452)

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चमत्कारों के रहस्य!

हम भूत-प्रेत, परग्रही द्वारा अपहरण से लेकर भविष्यवाणी करना, हवा से वस्तु उत्पन्न करने से लेकर पुनर्जन्म जैसी विचित्र बातों पर विश्वास कर सकते है। क्या आपने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है कि शिक्षित व्यक्ति भी इन बातों पर विश्वास करते है?

वैज्ञानिक सोच का अभाव

1.मान्यता द्वारा निरिक्षण पर प्रभाव:

यदि आप किसी सिद्धांत को मानते है तब वह सिद्धांत आपके निरीक्षण को प्रभावित करता है। आप परिणामो को अपने सिद्धांत के अनुसार परिभाषित करते है। कोलंबस भारत को खोजने के लिए अमरीका पहुंच गया था, उसकी मान्यता थी कि यदि वह युरोप के पश्चिम दिशा से यात्रा करेगा तो वह भारत पहुंच जायेगा। जब वह अमरीका पंहुचा, तब उसकी मान्यता के कारण तांबे रंग के मूल अमरीकी निवासीयों को वह भारतीय मान बैठा। यही नही उसे अमरीका मे भारतीय मसाले और जड़ी बुटीयां दिख रही थी। कोलंबस अपनी निरिक्षणों को अपनी मान्यता के बाहर देख ही नही पा रहा था।

2. निरीक्षक द्वारा निरीक्षीत मे परिवर्तन:

किसी भी वस्तु का अध्यन उस वस्तु की अवस्था मे परिवर्तन कर सकती है। यह किसी मानवविज्ञानी द्वारा किसी जनजाति के अध्ययन से लेकर किसी भौतिकविज्ञानी द्वारा इलेक्ट्रान के अध्ययन पर लागु होता है। इसी कारण से मानसीकचिकित्सक “ब्लाइंड और डबल ब्लाइंड तकनीको( blind and double-blind controls)” का प्रयोग करते है। इन तकनिको मे किसी वैज्ञानिक प्रयोग मे शामील व्यक्तियों से वह जानकारी छुपायी जाती है जिससे वह व्यक्ति के चेतन या अवचेतन मष्तिष्क पर कोई पूर्वाग्रह या पक्षपात उत्पन्न हो, ऐसा परिणामो की विश्वसनियता के लिए किया जाता है। छद्म विज्ञानी ऐसा कुछ नही करते है।

3.उपकरण परिणाम का निर्माण करते है:

किसी प्रयोग मे प्रयुक्त उपकरण परिणामों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए जैसे जैसे हमारे दूरबीनो की क्षमता बढ़ते गयी, हमारी जानकारी मे ब्रह्माण्ड का आकार भी बढ़ता गया। सीधे सीधे शब्दो मे मछली पकड़ने के जाल का आकार उसमे पकड़ी जाने वाली सबसे बड़ी मछली का आकार बतायेगा, ना कि तालाब मे सबसे बड़ी मछली का आकार!

4.श्रुति!= विज्ञान:

हम लोगो से जो किस्से कहानियाँ सुनते है, वह विज्ञान नही होता है। छद्म विज्ञानी श्रुति को मानते है जबकि विज्ञान प्रामाणिक अध्ययन को मानता है।

छद्मवैज्ञानिक सोच की समस्यायें

5.वैज्ञानिक भाषा का प्रयोग उसे वैज्ञानिक नहीं बनाती है:

किसी मान्यता की व्याख्या यदि वैज्ञानिक भाषा/शब्दो के प्रयोग से की जाये तो वह मान्यता वैज्ञानिक नही हो जाती। ज्योतिषी खगोल विज्ञान के शब्दो के प्रयोग से उसे वैज्ञानिक प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। सं रां अमरीका के “क्रियेशनीज्म” के समर्थको ने अपनी मान्यता को वैज्ञानिक शब्दो/भाषा के प्रयोग कर उसे वैज्ञानिक सिद्धांत के रूप मे पेश किया था लेकिन उनकी चाल पकड़ी गयी थी।

6. निर्भिक कथन उसे सत्य प्रमाणित नही करता है:

यदि आप लाखों लोगो के सामने निर्भिकता से कोई सिद्धांत पेश करें तो इसका अर्थ यह नही है कि आपका सिद्धांत सत्य है। कोई व्यक्ति अपने आपको भगवान कहे तो वह भगवान नही हो जाता। असाधारण कथन/दावे को प्रामाणित करने के लिए असाधारण प्रमाण चाहीये होते है।

7.विद्रोही/क्रांतीकारी मत का अर्थ सत्य नही होता है:

कोपरनीकस, गैलेलीयो तथा राईट बंधु विद्रोही/क्रांतिकारी विचारों के थे। लेकिन विद्रोही/क्रांतिकारी विचारों का होना ही आपको सही साबित नही करता है। होलोकास्ट से इंकार करने वाले विद्रोही/क्रांतिकारी विचार रखते है लेकिन वे गलत है क्योंकि उनके पास इसके प्रमाण नही है, जबकि उनके विरोध मे ढेर सारे प्रमाण है। ग्लोबल वार्मींग के विचार से असहमत लोग भी विद्रोही/क्रांतिकारी विचार रखते है लेकिन वे भी गलत है क्योंकि प्रमाण उनके विरोध मे हैं।

8.प्रमाणित करने की जिम्मेदारी:

असाधारण दावे को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी दावा करने वाले व्यक्ति की होती है। यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि उसने अपनी मानसीक शक्ति से पर्वत को हिला दिया है तो उसे प्रमाणित भी करना होगा।

9. अफवाहे सत्य नही होती है:

अफवाहो की शुरुवात होती है “मैने कहीं पढा़ था….” या “मैने किसी से सुना था…..“। कुछ समय पश्चात यह सत्य बन जाती है और लोग कहते है कि “मै जानता हूं कि……….“। इस तरह कि अधिकतर कहांनिया गलत होती है। इंटरनेट की चेन मेल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। एक उदाहरण है मोतीलाल नेहरू के पिता का नाम गयासुद्दीन गाजी होने की इंटरनेट पर फैली अफ़वाह। दूसरा उदाहरण है टाईम्स आफ इंडीया के संपादक द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को लिखा गया कथित पत्र।

10. अस्पष्ट का अर्थ रहस्यमय नही होता:

यदि आप किसी घटना की व्याख्या नही कर पा रहे है इसका अर्थ यह नही है कि उसकी व्याख्या नही की जा सकती है। आग पर चलना रहस्यमय लगता है लेकिन यदि आपको उसके पीछे के कारण बता दिये जाये तो वह आपको रहस्यमय नही लगेगा। यह सभी जादू की तरकीबो के साथ है, ये तरकीबे आपको उस समय तक जादुई लगेंगी जब तक आप उसके कार्यप्रणाली को नही जानते है। किसी घटना को कोई विशेषज्ञ भी समझ नही पाये तो इसका अर्थ यह नही है कि भविष्य मे कोई और उसे समझ नही पायेगा। १०० वर्ष पहले जीवाणु, परमाणु एक रहस्य हुआ करते थे। बिजली चमकने को इंद्रदेव का वज्र समझा जाता था।

11. असफलता की तर्कसंगत व्याख्या :

विज्ञान अपनी असफलता को मान्यता देता है, वह अपनी असफलता की तर्कसंगत व्याख्या करता है और अपने आपको पुनर्गठित करता है। यह छद्मविज्ञान के साथ नही होता है, वे असफलता को नजरअंदाज करते है या उसे किसी अज्ञात के मत्त्थे मढ़ देते है। जैसे जन्मतिथि की सही जानकारी ना होने से भविष्यवाणी गलत हुयी, पूजा मे कोई अशुद्ध व्यक्ति के शामिल होने से कार्य सही नही हुआ इत्यादि।

12.अंधविश्वास :

मैने अपने विशेष पेन से परिक्षा दी थी इसलिये अच्छे अंको से पास हुआ। उस खिलाड़ी ने उस नंबर की जर्सी नही पहनी थी इसलिये टीम हारी। इस तरह की मान्यतायें आत्मविश्वास की कमी से आती है। इस तरह की घटनाओ मे परिणाम और मान्य कारको के मध्य कोई संबंध नही होता है।

13. संयोग/संभावना:

अधिकतर लोगो को संभावना/प्रायिकता (Probability) के नियमो की जानकारी नही होती है। मान लिजीये कि आपने किसी को फोन करने फोन की ओर हाथ बढ़ाया और उसी का फोन आ गया। यह संयोग कैसे हो सकता है ? यह तो आपके मन और उसके मन के बीच मे कोई जुड़ाव से ही होना चाहीये ! यहां हम भूल जाते हैं कि हम किसी को हजारो बार फोन करते है, तब उसका फोन नही आता है। यदि आप सचिन तेंदुलकर को गेंद फेंके तब सचिन के बोल्ड होने की संभावना शुन्य नही होती है ! यह किसी सिक्के को उछाल कर चित/पट देखने से अलग नही है। लेकिन हम हर घटना के पीछे एक पैटर्न देखते है और नही होने पर अपने मन के अनुसार एक नया पैटर्न ढूंढ निकालते है!

तार्किक सोच में समस्याएं

14.प्रतिनिधी घटनायें :

कुछ घटनायें असामान्य लगती है लेकिन होती नही हैं। उदाहरण के लिए घर मे रात मे आने वाली खट-खट, ठक-ठक की आवाज भूतों की न होकर चुहों की होती है। बरमूडा त्रिभूज मे कई जहाज लापता हुये है क्योंकि इस भाग मे आने वाले जहाजो की संख्या ज्यादा है। वास्तविकता यह है कि इस क्षेत्र मे होने वाली दुर्घटनाओं का औसत अन्य क्षेत्र की तुलना मे कम है।
मेरे गृहनगर गोंदिया मे एक हाई वे पर एक विशेष स्थान पर दुर्घटनाएँ ज्यादा होती थी। वह स्थान सीधा था, कोई मोड़ नही, कोई बाधा नही। लोग उसे प्रेतात्मा का प्रकोप मानते थे। लेकिन वास्तविकता यह थी कि रास्ते के सीधे होने से लोग गति बढ़ा देते थे और दुर्घटना होती थी। यातायात पोलिस ने रोड विभाजक और गति नियंत्रक लगा दिये। दुर्घटनाएँ बंद हो गयी।

15.भावनात्मक शब्द और गलत उपमायें :

अलंकारो से भरी भाषा कभी कभी सत्य को छुपा देती है। भूषण कवि के अनुसार शिवाजी के सेना के हाथी जब चलते है तब पृथ्वी हिलती है, धूल के बादलो से सूर्य ढंक जाता है। इस तरह की अलंकारीक भाषा कई मिथको को जन्म देती है। विभिन्न धर्मग्रंथो की कहानियोँ मे यह स्पष्ट रूप से दिखायी देती है।
इसी तरह किसी राजनेता को “नाजी”, या “हत्यारा” जैसी भावनात्मक उपमाये दे दी जाती है जिनका अर्थ कालांतर मे बदल जाता है।

16.अनभिज्ञता का आकर्षण :

इसके अनुसार यदि आप किसी को झुठला नही सकते तो वह सत्य होना चाहीये। इसे भूतों, परामानसीक शक्तियों के बचाव मे प्रयोग किया जाता है। जैसे यदि आप भूतों, परामानसीक शक्तियों को झुठला नही सकते हो तो मानीये कि उनका अस्तित्व है। लेकिन समस्या यह है कि सांता क्लाज के अस्तित्व को भी झुठलाया नही जा सकता है। मै दावा करता हूं कि सूर्य मेरे आदेश से निकलता है, कोई इसे असत्य साबित कर के दिखाये ! विश्वास अस्तित्व के सकारात्मक प्रमाणो पर आधारित होना चाहीये, ना कि प्रमाणो के अभाव पर।

17. व्यक्तिगत आक्षेप :

इस विधी मे किसी व्यक्ति के नये क्रांतिकारी आइडीये पर से उस व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाकर द्वारा ध्यान बंटाया जाता है। जैसे डार्वीन को रेसीस्ट कह देना, किसी नेता को नाजीवादी करार देना। जार्ज वाशींगटन ने मानव गुलाम रखे थे लेकिन उससे उनकी महानता कम नही होती है। महात्मा गांधी पर लगे व्यक्तिगत आरोपो से भी उनकी महानता कम नही होती है।

18.अति साधारणीकरण:

इसे पूर्वाग्रह भी कहते है। इसमे पूरे तथ्यो को न जानते हुये भी परिणाम निकाले जाते है। जैसे किसी स्कूल मे दो शिक्षक अच्छे नही होने पर पूरे स्कूल को बुरा बना देना। या किसी कंपनी के इक्का दूक्का कारो मे आयी समस्याओं से पूरे ब्राण्ड को खराब कह देना।

19. व्यक्ति की छवि पर अति निर्भरता:

किसी भी तथ्य को बिना जांचे परखे नही स्वीकार करना चाहीये , चाहे वह किसी महान सम्मानित व्यक्ति द्वारा ही कहे गये हों। उसी तरह खराब छवि वाले व्यक्ति द्वारा दिये गये अच्छे तथ्य को बिना जांचे परखे खारीज नही करना चाहिये। हाल ही मे हुये अन्ना तथा बाबा रामदेव के आंदोलन इसके उदाहरण है।

20: या तो वह नही तो यह:

इस तर्क मे यदि एक पक्ष गलत है तो दूसरा सही होना चाहिये। उदाहरण के लिए ”क्रियेशन सिद्धांत”* के पक्षधर डार्वीन के ’क्रमिक विकास के सिद्धांत” पर हमला करते रहते है क्योंकि वह मानते है कि क्रमिक विकास का सिद्धांत गलत है। लेकिन क्रमिक विकास के सिद्धांत के गलत होने से भी क्रियेशन सिद्धांत सही सिद्ध नही होता है। उन्हे क्रियेशन सिद्धांत के पक्ष मे प्रमाण जुटाने होंगे।

21. चक्रिय तर्क :

इसमे एक तर्क को प्रमाणित करने दूसरे तर्क का सहारा लिया जाता है, तथा दूसरे तर्क को प्रमाणित करने पहले का। जैसे धार्मिक बहस मे:

क्या भगवान का आस्तित्व है ?
हां।
तुम्हे कैसे मालूम ?
मेरे धर्मग्रंथ मे लिखा है।
तुम कैसे कह सकते हो कि तुम्हारा धर्मग्रंथ सही है ?
क्योंकि उसे भगवान ने लिखा है।

विज्ञान मे :

गुरुत्वाकर्षण क्या है ?
पदार्थ द्वारा दूसरे पदार्थ को आकर्षित करने की प्रवृत्ति।
पदार्थ एक दूसरे को आकर्षित कैसे करते है ?
गुरुत्वाकर्षण से।

साधारण बहस मे:

राम कहां रहता है ?
श्याम के घर के सामने।
श्याम कहां रहता है?
राम के घर के सामने ?

22. किसी तथ्य का सहारा लेकर असंगत सिद्धांत हो सिद्ध करना:

इस मे किसी एक सर्वमान्य को तथ्य को लिया जाता है, उस पर एक नये तथ्य को प्रमाणित किया जाता है। दूसरे से तीसरे को, इस क्रम मे किसी असंगत नतिजे पर पहुंचा जा सकता है। जैसे : आइसक्रीम खाने से वजन बढता है। वजन बढने से मोटापा बढता है। ज्यादा मोटापे से हृदय रोग होता है। हृदय रोग से मृत्यु हो सकती है। इसलिये आइसक्रीम खाने से मृत्यु हो सकती है। 
कोई क्रियेशन सिद्धांत का समर्थक कह सकता है कि क्रमिक विकास के लिए भगवान की आवश्यकता नही है। यदि भगवान की जरूरत नही है, तो तुम भगवान को मानते नही हो। भगवान को न मानने मे नैतिकता नही है। इसलिये क्रमिक विकास को मानने वाले भगवान को नही मानते है और अनैतिक होते है।

सोचने में मनोवैज्ञानिक समस्याएं

23.प्रयास मे कमी तथा निश्चितता, नियंत्रण और सरलता की आवश्यकता:

हममे से अधिकतर निश्चितता चाहते है, अपने वातावरण पर नियंत्रण चाहते है और सरल व्याख्या चाहते है। लेकिन प्रकृति इतनी सरल नही है। कभी कभी हल सरल होते है लेकिन कभी कभी जटिल। हमे जटिल सिद्धांतो को समझने के लिए प्रयास करना चाहीये नाकि अपने आलस के कारण उन्हे ना समझ पाने के फलस्वरूप खारीज करना चाहिये।

24. समस्या के हल मे प्रयास की कमी:

किसी समस्या को हल करते समय हम एक अवधारणा बना लेते है और उसके बाद हम उस अवधारणा के अनुसार उदाहरण देखना शुरू कर देते है। जब हमारी अवधारणा गलत होती है तब हम उसे बदलने मे देर करते हैं। इसके साथ हम सरल हल की ओर झुकते है जबकि वह हर पहलू को हल नही करते हैं।

25.वैचारिक स्वाधीनता :

हम अपने मूलभूत विचारो से समझौता पसंद नही करते है। जो नये विचार हमारे परिप्रेक्ष्य मे सही नही होते है उनसे बचने के लिए हम अपने चारो ओर एक दीवार खड़ी कर देते है। जितनी ज्यादा प्रतिभा होगी, यह दिवार उतनी ऊंची होती है। हमारे विचित्र विचारो पर विश्वास रखने मे यह सबसे बड़ी बाधा होती है। हम इसरो और डी आर डी ऒ के वैज्ञानिको को हाथो मे अगुंठिया पहने देख सकते है।

माइकल शेर्मर की बेहतरीन पुस्तक “Why People Believe Weird Things” पढने के बाद उपजी पोस्‍ट।

* क्रियेशन सिद्धांत : इसके अनुसार पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति किसी दैवीय शक्ति ने की है। यह डार्विन के प्रचलित क्रमिक विकास के सिद्धांत को नहीं मानता है।

आत्मा के साथ बातें

1941 में जाफना के जिला न्यायाधीश ने अपनी मृतका पत्नी के साथ अपने घरेलू और व्यक्तिगत मुआमलों के बारे में काफी लम्बी बातचीत करने के बाद कीमती जानकारी हासिल की थी! इन जज का नाम साइमन राडरिगो था और यह पानादुरा के रहने वाले थे! जिस व्यक्ति के माध्यम से उन्होंने अपनी मृत पत्नी के साथ बातचीत की उसका नाम मिस्टर एक्स था और वह मैनीपे का रहने वाला था!

मिस्टर राडरिगो को अपनी प्यारी पत्नी की म्रत्यु के बाद उसकी याद निरंतर सता रही थी! इस कारण वह उसी दिन से आत्मा सम्बंधित पुस्तकों में रूचि लेने लगा था! इस बात में कोई संदेह नहीं था कि जाफना पब्लिक लाइब्रेरी की सारी पुस्तकें या तो मिस्टर राडरिगो के घर की मेज पर या फिर जिला न्यायलय के कमरे में मिलती थीं, लाइब्रेरी की अलमारियों में नहीं! इसलिए किताबों की तलाश के कारण ही इनका मेरे साथ मेलमिलाप स्थापित हुआ क्योंकि मेरी प्राइवेट लाइब्रेरी में भी इसी विषय पर बहुत सी पुस्तकें थी! ‘म्रत्यु पश्चात् जीवन, इसी विषय पर हम दोनों घंटों बहस करते रहते थे!

उपरोक्त विषय के सम्बन्ध में मिस्टर राडरिगो की जानकारी इतनी विशाल और गहरी थी कि वह आत्म ज्ञान विषय पर अलग अलग लेखकों द्वारा लिखी बातों का किसी भी समय हवाला दे सकते थे! वह बाइबिल की 66 पुस्तकों में से किसी भी पाठ और वाक्य का हवाला दे सकते थे! भले ही जन्म से ही वह बुद्ध धर्म को मानने वाले थे, परन्तु आत्मा के अस्तित्व के बारे में बौद्धों की पुस्तकों को मानने की बजाय वह ईसाई लेखकों की आत्म ज्ञान के बारे में लिखी पुस्तकों पर अधिक विश्वास करते थे!

5 नवम्बर 1941 को मिस्टर राडरिगो मेरे घर आये! वह बहुत प्रसन्न थे! वह ऊँची आवाज में बोले, “अब्राहम! आखिर मैं अपनी मृत पत्नी के साथ बातचीत करने में सफल हो गया हूँ! उसने मेरे साथ एक घंटा बातचीत जी और उसने बहुत सी बातों के बारे में बताया, जिनको वह अपनी म्रत्यु से पहले मुझे बताना भूल गयी थी! आगामी रविवार को फिर मैं अपनी पत्नी के साथ बात करूँगा! तब मैं उससे और भी बहुत कुछ पूछूँगा जो मैं जानना चाहता हूँ!” यह शब्द उसने मुश्किल से कहे क्योंकि वह भावुक हो गए थे! उनके आंसू उनके गालों को भिगो रहे थे! वह कुछ देर चुप रहे! फिर उन्होंने एक प्याला गर्म काफी का पिया और कुछ साहस का अनुभव करते हुए अपनी बात को चालू रखा! उन्होंने बताया कि कैसे वह मैनीपे के मिस्टर एक्स से मिले, जिसके पास प्रेतों से बात करवाने की शक्ति थी, और कैसे उन्होंने उसके माध्यम से अपनी मृत पत्नी की आत्मा से बातें की! उनकी आगामी मुलाकात पर मैंने उनके साथ होने की इच्छा प्रकट की! परन्तु मिस्टरराडरिगो ने कहा कि वह अकेले ही अपनी पत्नी से कुछ गोपनीय बातों के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं!

मैंने मिस्टर एक्स को पत्र द्वारा प्रार्थना की कि वह मुझसे मिलें!22 नवम्बर 1941 को वह मेरे पास आया! जैसे ही मैं उसका स्वागत करने के लिए आगे बढ़ा, मिस्टर एक्स ने कहा, “मुझे काफी दूर से आपके सर के चारों ओर एक प्रकाश चक्र नजर आया है! मुझे मिस्टर राडरिगो ने बताया की आप आध्यात्मवाद के अच्छे विद्यार्थी हो और आपकी नक्षत्रों में बहुत दिलचस्पी है, क्या यह ठीक है?” मैं चुप ही रहा और मिस्टर एक्स को अपनी बात कहने दी! उसकी बात ने मुझे उसके बारे में एक धारणा बनाने योग्य बना दिया!

मिस्टर एक्स

मिस्टर एक्स एक अच्छे घराने का सदस्य था, जिसे उसके धार्मिक मातापिता ने ईसाई माहौल में पाला पोसा था! उसने जाफना के क्रिस्चियन स्कूल से विद्या प्राप्त की और वहां ही उसपर यूरोपीय ईसाइयों का प्रभाव पड़ा! अच्छा पढ़ा लिखा और अमीर होने के कारण वह एक सम्मानीय व्यक्ति था! उसे अपनी आजीविका चलाने के लिए ऐसे पाखंड करने की कोई जरुरत नहीं थी! वह पवित्र स्वाभाव का था! जब वह नवयुवक था, उसकी इच्छा ईसाई पादरी बनने की थी, परन्तु जब उसके एक बड़े भाई ने यह काम करना शुरू कर दिया तब उसने यह विचार त्याग दिया!

उसे अपनी पहली पत्नी से बहुत ज्यादा प्यार था, जो कि 1926 में एक लड़की को जन्म देनें के पश्चात् मर गयी थी! भले ही उसने दूसरी शादी कर ली थी, मगर उसकी पहली पत्नी की याद सदा उसके मन में रही! मिस्टर राडरिगो की तरह ही वह भी अपनी पत्नी की मृत्यु के बादआत्मज्ञान में काफी रूचि लेने लग गया था! वह लन्दन की आध्यात्मिक अनुसन्धान की एक संस्था का सदस्य बन गया और उस संस्था की पत्रिका लगातार पढ़ने लग गया! उसके पास अपने ससुर और पत्नी की तस्वीरें थीं, जो की उनकी म्रत्यु के कई वर्ष बाद ली गयीं थीं! यह तस्वीरें इंग्लैंड के ‘आत्माओं की फोटो लेनें वाले किसी फोटोग्राफर ने ली थीं! भले ही उन तस्वीरों की असलियत पर उसे संदेह था, फिर भी वह उनको अपनी अलमारी में रखता था, ताकि समय पर दूसरों को दिखाई जा सकें! उसके अनुसार वह तस्वीरें सम्बंधित व्यक्तियों से नहीं मिलती थीं!

1934 में पहली बार उसका अपनी मृत पत्नी से संपर्क स्थापित हुआ! उसके बाद कई बार उसका उसकी पत्नी के साथ संपर्क हुआ! उसने जो सन्देश अपनी पत्नी से प्राप्त किये उनमें से बहुत से गलत थे और कुछ ठीक थे! उसकी पहली लड़की की शादी उसकी मृत पत्नी से पूछने के पाश्चत ही की गयी! उसके कहने के अनुसार उसमें इतनी शक्ति पैदा हो गयी थी कि वह अपनी मृत पत्नी के साथ किसी भी समय, किसी भी स्थान पर संपर्क स्थापित कर सकता था!

आत्मा से संपर्क

उसकी इस अवस्था को देखने के लिए मैंने उससे प्रार्थना की कि वह अपनी पत्नी की आत्मा के साथ संपर्क स्थापित करे! उसने इस उद्देश्य के लिए एकांत स्थान की मांग की! मैंने उसे लाइब्रेरी में भेज दिया और उसके बैठने के लिए कुर्सी दे दी! उसके आग्रह पर सभी खिड़कियाँ बंद कर दी गयीं! कुछ मिनट के लिए सामने वाली दीवार पर लगातार देखने के बाद उसने अपनी समाधी भंग की और कहा, “अब मैं अपनी पत्नी को साफ़ देख सकता हूँ वह सामने उस स्थान पर कड़ी है और मेरी और देख रही है!” वह दीवार पर लगे बड़े चित्रों की और संकेत कर रहा था! इनमें से एक चित्र मेरे पिता का भी था! “क्या आप दीवार पर लटक रही तस्वीर को देख सकते हो?” मैंने पूछा! “वहां कोई दीवार नहीं है! मैं तो अपनी पत्नी को नीले आकाश में, बादलों के बीच खड़ी हुई देख रहा हूँ!” उसने उत्तर दिया! मैं दीवार के पास गया और अपने पिता की तस्वीर को हाथ लगाकर उससे पूछा, “क्या यह आपकी पत्नी है?” वह बोला, “हाँ, यह वही है! इसे हाथ लगाने की कोशिश मत करो नहीं तो यह अवश्य ही गायब हो जाएगी!” फिर उसने मुझे बताया कि उसकी आत्मा किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए तैयार है! मैंने जो बहुत से प्रश्न पूछे उसका उत्तर उसने स्वयं दिया परन्तु यह प्रकट किया कि यह उत्तर उसकी पत्नी की आत्मा दे रही है!

आत्मा की आवाज़

“ईसाई एक सच्चा धर्म है! पुनर्जन्म और अवतार लेना कुछ भी नहीं होता! आत्माओं को पृथ्वी पर जन्म लेने से पहले की जिंदगी के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता! आत्माओं की दुनिया में भी भोजन और मदिरा होता है! आत्माएं भी नेताओं के नेतृत्व में छोटे छोटे समूहों में रहती हैं! नाशवान व्यक्तियों से बात करने के लिए आत्माओं को भी अपने नेताओं से आज्ञा लेनी पड़ती है! आत्माओं में भी काम वासना होती है! मेरी पत्नी चाहती है कि मेरी मृत्यु के बाद हम फिर पति पत्नी जैसी जिंदगी जीते रहें! आत्माएं सफ़ेद, ढीले और उड़ने वाले कपड़े पहनती हैं! घटिया जानवरों की कोई आत्मा नहीं होती! दूसरे नक्षत्रों पर भी मनुष्य रहते हैं! आत्माएं उन शरीरों में ही रहती हैं जिनमें वह मृत्यु के पहले रहती थीं! आत्माओं के संसार के पश्चात् वह जिंदगी के ऊंचे स्तर पर चली जाती हैं और अंत में वह परमात्मा की दुनिया में पहुँच जाती हैं! रूहों की दुनिया में भी व्हिस्की और सोडा होता है! सभी रूहें अंग्रेजी भाषा बोलती हैं!

मैं और मिस्टर एक्स लाइब्रेरी के कमरे से बाहर आ गए और दुसरे कमरे में आकर भी बातचीत करते रहे! मैंने उससे रूहों से बात करने से पहले, उस समय और उसके बाद के अनुभवों के बारे में पूछा तो उसने बताया की जिस समय वह विचारों में लीं होने लगता है तो उसे पहले कुछ प्रकाश और आकार दिखाई देते हैं! उसकी पत्नी के लिए यह जरुरी नहीं की वह प्रकट होकर बातें करे! उसने अपनी पत्नी के सिवाय और आत्माओं से भी बातें की हैं! रूहों से बात करने के पश्चात् उसे थकान और प्यास का अनुभव होता है और उसे नींद आती है!

मानसिक रोगी

मिस्टर एक्स जैसे रोगियों की ऐसी अजीब बातों का वर्णन आज के युग में मनोविज्ञान द्वारा किया जा सकता है! ऐसे व्यक्तियों के व्यक्तिगत अनुभवों में किसी प्रकार की कोई सच्चाई नहीं होती! मिस्टर एक्स और  मिस्टर राडरिगो दोनों ही अपनी मृत पत्नियों के वियोग के कारण अर्धपागल पागल थे! आत्माओं के बारे में लगातार पढ़ते रहने के कारण उनका विश्वास आत्माओं के प्रकट होने में पक्का हो गया था! वह यह समझने लगे कि आत्माओं के साथ बातचीत करनी संभव है!

चाहे वो और सभी पक्षों से सामान्य व्यक्तियों जैसे ही थे, परन्तु दोनों ही आत्माओं की गिरफ्त में होने के कारण अर्धपागल थे! दोनों ही आत्माओं के दीवाने हो गए थे! दीवानेपन के कारण कई मनुष्यों में दिमागी विकार उत्पन्न हो जाने संभव होते हैं! अनेक प्रकार के डर और भ्रम इसी प्रकार से पैदा होते हैं! मिस्टर एक्स इस प्रकार के भ्रम का बुरी तरह शिकार था!यह इस बात से प्रमाणित होता है कि वह अजीब प्रकाश और आकार देखता था और मेरे जैसे साधारण व्यक्ति के सर के चारों ओर उसे प्रकाश चक्र दिखाई पड़ते थे! उसके ऐसे भ्रम के कारण ही उसको मेरे पिताजी की तस्वीर में अपनी पत्नी दिखाई देने लगी! उसको न तो दीवार दिखाई देती थी और न ही तस्वीर! उसका भ्रम इतना शक्तिशाली था कि दीवार भी उसके लिए नीले आकाश में बदल गयी थी और पिताजी की तस्वीर के स्थान पर उसे अपनी मृत पत्नी दिखाई देने लगी!

विश्लेषण

जो कुछ मिस्टर एक्स कहता था कि उसकी पत्नी की आत्मा बता रही है, यह उसके ईसाई धर्म में श्रृद्धा रखने के कारण सिर्फ अपने विचार ही थे! आत्माओं की दुनिया में मदिरा और भोजन के बारे में उसके विचार ईसा मसीह की बाइबिल वाले ही थे! अगर आत्माएं भी खाती पीती हैं तो हमें यह निष्कर्ष निकलना चाहिए कि वह भी नाशवान हैं! क्योंकि व्हिस्की और सोडा रूहों की दुनिया में भी मिलता है, इसलिए शराब के कुछ कारखाने दारों को तो अपनी मृत्यु के पश्चात् रूहों की दुनिया में भी कमाई होने का विश्वास हो सकता है!

यह बात भी बाइबिल के अनुसार ही है कि घटिया जानवरों की रूह नहीं होती! अगर मिस्टर एक्स हिन्दू होता तो उसने  बक्टीरिया को भी रूह दे देनी थी! मृत्यु के पश्चात् भी पति और पत्नी की जिंदगी जीने की मिस्टर एक्स की लालसा उसके भीतर के मन की बात है! शायद वह यह सच्चाई भूल गया है कि उसकी दूसरी पत्नी की मृत्यु के बाद उसे रूहों की दुनिया में दो पत्नियों की आत्माएं मिलनी चाहिए!

मिस्टर एक्स अपने ससुर और पत्नी की रूहों की तस्वीरों के मसले में तो इंग्लॅण्ड के झूठे फोटोग्राफर द्वारा दूसरों की तरह ही ठगा गया था! फ्रेड वोर्लो और मेजर रैपलिंग रोज़ ने रूहों के फोटोग्राफरों के धोखापूर्ण ढंगों का अच्छी तरह पर्दाफाश किया है! बिछुड़ी रूहों का अपने शरीर में ही रहना मिस्टर एक्स का एक और मूर्खतापूर्ण विचार है! क्या लाशों के गलने और सड़ने के पश्चात् किन्ही और तत्वों की सहायता से दोबारा फिर वही शरीर बन जाते हैं?

(अब्राहम कोवूर की पुस्तक Begone Godmen से साभार)