रजनीश से ‘ओशो’ रजनीश बनने की कहानी : उन्ही की जुबानी

मैंने ओशो का केवल नाम ही सुना था! ढेर सारे बाबाओं की लिस्ट में से उन्हें भी एक ही मानता था! कई बार उन्हें पढ़ने का मौका भी मिला, मगर मैंने उन्हें नहीं पढ़ा! कारण था बाबाओं को लेकर मेरे मन का पूर्वाग्रह! मगर जब एक बार उन्हें सुना, तो यह धारणा टूट गयी! जिन्होंने ओशो को पढ़ा या सुना है, उनमें से कई लोगों के मन में सवाल आया होगा कि आखिर इस ईश्वर विरोधी शख्स ने बाबाओं जैसे इस भेष को क्यों चुना? क्यों खुद को भगवान घोषित कर लिया? इस सवाल का जवाब अगर आप उन्हीं के शब्दों में सुनेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा! इसलिए प्रस्तुत है ओशो रजनीश द्वारा 12 जनवरी, 1985 को दिए गए भाषण के अंश!
ओशो रजनीश जवानी में यूनिवर्सिटी में मैं नास्तिक और अधार्मिक व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। प्रत्येक आचार व्यवस्था के खिलाफ था और आज भी यह बरक़रार है। इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटा। पर नास्तिक, अधार्मिक और प्रत्येक आचार व्यवस्था विरोधी पहचान मेरे लिए एक समस्या बन गयी। लोगों के साथ किसी तरह का संचार मुश्किल था। लोगों के साथ किसी तरह का संपर्क स्थापित करना लगभग असंभव था। जब लोगों को पता चलता कि मैं नास्तिक हूँ, अधार्मिक हूँ और आचार व्यवस्था का विरोधी हूँ तो वे सारे दरवाजे बंद कर लेते। मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता, किसी स्वर्ग-नरक में विश्वास नहीं करता। लोगोँ के लिए यह विचार ही मुझसे दूर भागने के लिए काफी था। मैं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था इसलिए सैकड़ों प्रोफेसर, शोध छात्र मुझसे कतराते थे क्योंकि वे जिस चीज में विश्वास रखते थे उसे कहने का उनमें हौसला नहीं था। अपने विचारों के लिए उनके पास कोई तर्क नहीं था।
विश्वविद्यालय की सड़कों के नुक्कड़ों पर, पान की दुकानों पर, जहाँ भी कोई मिलता, वहीँ तर्क करता रहता था। मैं धर्म पर सीधी चोट करता था, लोगों को इस बकवास से पूरी तरह छुटकारा दिलाने की पूरी कोशिश करता था। इसका परिणाम यह निकला कि मैं एक द्वीप बनकर रह गया। कोई मुझसे बात करके राजी नहीं था। उन्हें डर था कि यदि उन्होंने मुझे बुलाया तो पता नहीं मैं उनको कहाँ ले जाऊँ। आख़िरकार मुझे अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।
मैं सचेत हुआ कि जो लोग सत्य की खोज के इच्छुक हैं वे आश्चर्य की सीमा तक धर्म से जुड़े हैं। अधार्मिक समझा जाने के कारण मैं उनसे विचार विमर्श नहीं कर सकता था। यही लोग सत्य की खोज के इच्छुक थे। यही लोग थे जो मेरे साथ अनजानी राहों पर चल सकते थे। पर ये लोग पहले ही किसी धर्म सम्प्रदाय या दर्शन से जुड़े थे। उनका मुझे अधार्मिक सोंचना ही बाधा बन गया। इन्हीं लोगों की मुझे जरुरत थी।
वे लोग भी थे जो धर्म में लीन नहीं थे, पर उनमें सत्य की खोज की जिज्ञासा नहीं थी। यदि उन्हें प्रधानमन्त्री पद और सत्य में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाता तो वे प्रधानमंत्री पद को प्राथमिकता देते। सत्य के बारे में वे कहते, “कोई जल्दी नहीं। यह तो कभी भी किया जा सकता है। प्रधानमंत्री पद फिर शायद कभी न मिले। सत्य तो हर किसी का स्वभाव है, इसे कभी भी प्राप्त किया जा सकता है। सबसे पहले वह करना चाहिए जो क्षणिक है, समयबद्ध है और जिसका समय हाथ से निकल रहा है। ऐसा सुहाना सपना शायद फिर न आये। सत्य तो कहीं भागा नहीं जाता।”
उनका रुझान सपने, कल्पना की ओर था। उनकी और मेरी बातचीत असंभव थी क्योंकि मेरे और उनके हित अलग अलग थे। मैंने पूरी कोशिश की पर इन लोगों की धर्म में, सत्य में और अन्य किसी महत्वपूर्ण बात में रूचि नहीं थी। जिनकी रूचि थी वे ईसाई थे, या हिन्दू, मुसलमान, जैन या बौद्ध थे। वे पहले ही किसी धर्म या विचारधारा से जुड़े थे। अब मुझे स्पष्ट हो गया था कि मुझे धार्मिक होने का नाटक करना पड़ेगा। कोई और रास्ता भी नहीं था। इसके बाद ही मुझे असली खोजी मिल सकते थे।
मैं धर्म शब्द से ही नफ़रत करता था। मैंने सदा इससे नफरत की है। पर मुझे धर्म पर बोलना पड़ा। धर्म की आड़ में जो बातें कहीं असल में वो वह नहीं था जो लोग समझते थे। वह सिर्फ रणनीति थी। उनके शब्द ईश्वर, धर्म और मुक्ति का मैं प्रयोग कर रहा था पर उन्हें अपने अर्थ दे रहा था। इस तरह मैंने लोगों को ढूँढना शुरू किया, वे मेरे पास आने लगे।
लोगों की नजरों में अपनी छवि सुधारने में कई वर्ष लगे। लोग शब्द तो सुनते थे पर उनके अर्थ नहीं समझते थे। लोग वही समझते हैं जो तुम कहते हो। जो कुछ अनकहा रह जाता, वो उसे नहीं समझते थे। इसलिए मैंने उनके हथियार को ही उनके ख़िलाफ़ प्रयोग किया। मैंने धर्मग्रंथों पर टिप्पणी की मगर उन्हें अपने अर्थ दिए। वह चीजें मैं बिना टिप्पणी के भी कह सकता था, वह मेरे लिए आसान थी, क्योंकि तब मैं सीधा तुमसे बात कर रहा होता। फिर कृष्ण, महावीर और ईसा को बीच में घसीटने की कोई जरुरत नहीं थी, वह सब भी कहने की जरुरत नहीं थी, जो उन्होंने कभी नहीं कहा। यह मानवता की मूर्खता है कि वहज बातें जो मैं पहले कहता रहता था, जिन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं था, अब क्योंकि मैं कृष्ण बोल रहा था इसलिए हजारों लोग मेरे आस पास इकट्ठे होने लगे।
यही एकमात्र तरीका है। जब मैंने ईसा पर बोलना शुरू किया तो ईसाई कॉलेजों और ईसाई धार्मिक संस्थाओं नें मुझे बोलने के लिए बुलाना शुरू किया, मैं मन ही मन हमेशा हँसता रहता। क्योंकि मूर्ख समझते हैं कि यह ईसा ने कहा है। हाँ, मैंने ईसा के शब्द प्रयोग किये हैं। किसी के शब्दों के खेल को समझने की जरुरत है, फिर किसी भी शब्द को कोई भी अर्थ दिया जा सकता है। वे सोंचते हैं कि यही ईसा का वास्तविक सन्देश है। वे कहते हैं कि ईसाई मिशनरियों और पादरियों ने ईशा के लिए इतना नहीं किया जितना आपने किया है।
मैं चुप रहता। मैं जानता था मुझे ईसा से कुछ नहीं लेना। जो कुछ मैं कह रहा था, ईसा तो उसे समझ भी नहीं सकता। वह बेचारा तो बिलकुल अनपढ़ व्यक्ति था। इसमें कोई शक नहीं कि उसका व्यक्तित्व चुम्बकीय है। उसके लिए अनपढ़ और स्वर्ग के लोभियों को इकठ्ठा करना मुश्किल काम नहीं था। यह आदमी वादे करता था और इसके बदले में माँगता कुछ नहीं था। फिर उसमें विश्वास करने में क्या हर्ज है? कोई खतरा नहीं, कोई जोख़िम नहीं। यही कोई ईश्वर नहीं, स्वर्ग नहीं, तो तुमने कुछ नहीं खोया। यदि ये कहीं हों तो मुफ़्त लाभ ही लाभ। बहुत आसान हिसाब किताब है। यह आदमी कुछ नहीं जनता। उसके पास कोई तर्क नहीं है। वह उन्हीं चीजों को दोहराता है जो उसने दुनिया से सुनी हैं। परन्तु वह कट्टर किस्म का अड़ियल नौजवान था। जो कुछ मैं ईसा के नाम पर कहता था, वह पहले भी कह रहा था। पर तब किसी ईसाई कॉलेज या धार्मिक संस्थाओं नें मुझे नहीं बुलाया। बुलाना तो दूर, अगर मैं जाने की कोशिश भी करता तो दरवाजे बंद कर लेते। यह स्थिति थी। मुझे मेरे अपने शहर के बीच स्थित मंदिर में जाने से रोका गया… पुलिस की सहायता से। पर अब उसी मंदिर वालों नें मुझे बुलाना शुरू किया।
मैंने अपने ढ़ंग तरीके निकाले। मैं ईश्वर पर बात करता और कहता कि ईश्वर तो बहुत अच्छा शब्द है। मैं ईश्वरता पर बोल रहा था इसलिए पुजारियों से ठगे गए सत्य के पथिकों नें मुझमें रुचि लेनी शुरू कर दी। मैंने सभी धर्मों का सार इकठ्ठा कर लिया। मैंने रास्ता ढूँढ लिया। मैंने सिर्फ यह सोंचा, “उनके शब्दों का इस्तेमाल करो, उनकी धार्मिक पुस्तकें इस्तेमाल करो। यदि तुम किसी और की बन्दूक चला रहे हो तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम अपनी गोलियाँ नहीं प्रयोग कर सकते। बन्दूक किसी की भी हो, गोलियाँ मेरी ही हैं। असली काम तो गोलियों को ही करना है, फिर क्या हर्ज है? यह बहुत आसान काम था। मैं हिन्दू शब्दों का इस्तेमाल करके वही खेल खेल सकता था, मुसलमानी शब्द प्रयोग करके यही खेल खेल सकता था, ईसाई शब्दावली प्रयोग करके खेल खेल सकता था।”
मेरे पास सिर्फ यही लोग नहीं आये बल्कि जैन, साधु, साध्वियाँ, हिन्दू और बौद्ध साधू, ईसाई मिशनरी और पादरी हर किस्म के लोग मेरे पास आये। तुम यकीन नहीं करोगे, तुमने मुझे कभी हँसता हुआ नहीं देखा होगा। अंदर ही अंदर मैं इतना हँसा हूँ कि अब मुझे हंसने की जरुरत ही नहीं पड़ती। मैं तुम्हें सारी उम्र लतीफ़े सुनाता रहा हूँ पर मैं नहीं हँसता क्योंकि मैं तो सारी उम्र मजाक ही करता रहा हूँ। इससे अधिक मजाक की बात क्या हो सकती है कि मैं सारे पादरियों और महान विद्वानों को इतनी आसानी से बुद्धू बनाने में कामयाब हुआ। वे मेरे पास सवाल लेकर आने लगे। शुरू शुरू में मुझे उनके शब्द सावधानी से बोलने पड़ते। मैं शब्दों और पंक्तियों में अपने विचार चला देता, जिनमें मेरी रूचि होती।
शुरू शुरू में लोगों को धक्का सा लगा। वे लोग, जो जानते थे कि मैं नास्तिक हूँ, असमंजस में पड़ गए। स्कूल का मेरा एक मास्टर कहता है, “क्या हो गया? क्या तू बदल गया?” और उसने मेरे पैर छुए। मैंने कहा, “पैरों को हाथ मत लगाओ। मैं नहीं बदला और मरते डैम तक नहीं बदलूँगा।” ऐसा कई बार हुआ। एकबार मैं जबलपुर मुस्लिम संस्था में बोल रहा था। मेरा मुसलमान टीचर वहाँ प्रिंसिपल था। जब मेरे टीचर ने मुझे देखा तो कहने लगे, “मैंने मुअजजे  होते सुने हैं पर यह तो अचानक मुअजजा है। तू सूफ़ीवाद और इस्लाम की आधारभूत फिलॉसफी पर बोल रहा है?” मैंने कहा, “मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा, आप मेरे पुराने टीचर हो। मैं तो अपने दर्शन पर ही बोलूँगा। हाँ कभी कभार इस्लामी शब्द चलाऊँगा, बस…।” …. अब मैंने अपने लोगों का चुनाव किया। सारे भारत में मैंने अपने ग्रुप बनाने शुरू किये।अब मेरे लिए सिख मत, हिंदू या जैन मत पर बोलना अनावश्यक था। पर लगातार दस वर्ष मैं इनपर बोलता रहा। धीरे धीरे जब मेरे अपने लोग हो गए तो मैंने बोलना बंद कर दिया। बीस साल सफ़र में रहकर मैंने सफ़र करना बन्द कर दिया। क्योंकि अब जरुरत ही नहीं थी। अब मेरे अपने लोग थे। दुसरे आना चाहते तो मेरे पास आ सकते थे। …कई साल सन्यास देने के बाद काम छोड़ दिया, तीन साल के लिए। एक अंतराल जिसमें कोई जाना चाहे तो जा सकता था। क्योंकि मैं किसी की जिंदगी में दखल नहीं देना चाहता था।
(रजनीश बाइबिल, वोल्यूम 3, पृष्ट 438 से 452)

कौन हैं डाक्टर अब्राहम कोवूर ?

डाक्टर अब्राहम कोवूर दुनिया के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एवं सच्चे अर्थों में तर्कशील व्यक्ति थे! उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अलौकिक घटनाओं के पीछे के सत्य की खोज में व्यतीत कर दिया! उन्होंने लगभग पचास वर्षों तक हर प्रकार के मानसिक, अर्ध मानसिक एवं आत्मिक चमत्कारों का गहराई से अध्ययन किया और इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि इन बातों में लेश मात्र भी सत्य नहीं होता! इस संसार के मनोचिकित्सकों में वह अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जिनको इस क्षेत्र में खोज करने के फलस्वरूप पीएचडी की डिग्री प्राप्त हुई! अमेरिका की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनेसोटा’ ने  मनोविज्ञान एवं ऐसे ही अन्य चमत्कारों की खोज के फलस्वरूप उन्हें पीएचडी की डिग्री प्रदान की! डॉ. कोवूर का कहना है कि जो व्यक्ति अपने पास आत्मिक या अलौकिक शक्तियां होने का दावा करता है, वह या तो धूर्त है या मानसिक रोगी! उनका कहना है कि न तो कोई अलौकिक शक्ति वाला पैदा हुआ है, और न ही किसी के पास अलौकिक शक्ति है! उनकी सत्ता सिर्फ धर्म ग्रंथों और सनसनी फ़ैलाने वाले समाचार पत्रों के पन्नों तक ही सीमित होती है!

केवल डॉ कोवूर ही एशिया के एकमात्र ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्हें अमेरिका के जैव विकास विभाग ने भारतीय समुद्र एवं खाड़ी के अन्य देशों के समुद्रों में ऐसी वस्तुएं खोजने का निमंत्रण दिया था जिनसे जैव विकास की खोज में हो रही त्रुटियों को पूरा किया जा सके! परन्तु उनकी पत्नि की लम्बी बीमारी और बाद में म्रत्यु के कारण उन्हें यह निमंत्रण अस्वीकार करना पड़ा! डॉ कोवूर ने दूर दूर तक यात्रा की और बहुत से देशों में विशाल जनसमूह को संबोधित किया! बहुत से केसों के बारे में उनकी पड़ताल दुनिया की अलग अलग पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं! उनके एक केस की सत्य कथा पर मलयालम भाषा में एक फिल्म का निर्माण भी हो चुका है! एक तमिल नाटक ‘नम्बीकाई’ जो विशाल जनसमूह के आगे कई बार प्रदर्शित किया जा चुका है, भी उनके केसों में से एक पर आधारित है!

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डॉक्टर अब्राहम कोवूर

डाक्टर अब्राहम कोवूर, जिन्होंने अन्धविश्वास के प्रति लोगों को सचेत करने में अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया, का जन्म 10 अप्रैल, 1898 में केरल के एक शहर ‘तिरुवाला में हुआ! डॉ कोवूर के शब्दों में,आज से 75 वर्ष पूर्व मैंने केरल की सुन्दर भूमि पर सीरिया के एक ईसाई परिवार में जन्म लिया! मैं एक ईसाई का पुत्र था और मेरा जन्म भौगोलिक और जीव वैज्ञानिक घटना थी! यह न टो मेरी इच्छा के फलस्वरूप था और न ही मेरा इसपर कोई अधिकार था! जब मैंने होश संभाला तो मैंने उतने ही सौंदर्य से परिपूर्ण देश श्रीलंका को अपना देश एवं तर्कशीलता को अपने दर्शन के रूप में चुन लिया! डॉ कोवूर के पिता ‘रैव कोवूर एक पादरी थे और खुद का एक स्कूल भी चलाते थे! बालक कोवूर ने अपने स्कूल की पढाई अपने पिता के स्कूल में ही पूरी की, और उच्च शिक्षा के लिए अपने छोटे भाई ‘डॉ बहिनान कोवूर के साथ कोलकाता आ गए! उन्होंने बंगवासी कालेज, कलकत्ता से जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान में निपुणता प्राप्त कर ली!

डॉ कोवूर ने सी.एम्.सी. कोलेज कोट्टायम में दो वर्ष तक सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्य किया फिर 1928 में जाफना (श्रीलंका का एक नगर) के केन्द्रीय कालेज के प्रिंसिपल ‘पी.टी. कैश के निमंत्रण पर वह जाफना चले गए! जाफना में केन्द्रीय कालेज में डॉ कोवूर को अपने प्रथम वर्ष में ही अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को वनस्पति विज्ञान से साथ ही बाइबिल पढ़ाने के लिए कहा गया! जब कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी का परिणाम घोषित हुआ, तो उनके सभी विद्यार्थी अच्छे अंक लेकर पास हो गए! मगर अगले वर्ष डॉ कोवूर को बाइबिल का विषय देने से मना कर दिया गया! जब उन्होंने प्रिंसिपल से इसका कारण पूछा तो प्रिंसिपल ने मुस्कुराकर जवाब दिया, डॉ कोवूर मैं जनता हूँ कि आपने बाइबिल का बहुत अच्छा परिणाम निकाला है लेकिन आपके सभी विद्यार्थियों का धर्म से विश्वास उठ गया है! 1943 में जब पी.टी. कैश रिटायर हो गए तो डॉ कोवूर ने भी जाफना का केन्द्रीय कालेज छोड़ दिया और थॉमस कालेज माउंट लावीनीय में नौकरी कर ली! 1959 में वह थरशटन कालेज कोलम्बो से विज्ञान विभाग के अध्यक्ष पद की सेवा से मुक्त हो गए!

नौकरी से रिटायर होनें के बाद डॉ कोवूर ने अपनी जिंदगी भर के आत्मिक एवं मनोवैज्ञानिक चमत्कारों के अनुसंधानों के बारे में लिखना व बोलना शुरू कर दिया! सभी बच्चों की तरह उनके लिए भी बचपन में अपने माता-पिता की तरफ से धर्म एवं झूठे विश्वासों से बचना पहाड़ जैसा मुश्किल कार्य था! उसी गलती को दोहराने से बचने के लिए डाक्टर कोवूर ने अपने इकलौते पुत्र, एरिस कोवूर को धर्म के नाम पर ऐसे गलत विचारों की शिक्षा न देने का फैसला किया! अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए प्रोफेसर एरिस कोवूर आज फ़्रांस और क्यूबा की सरकारों के अधीन विज्ञान में खोज करने का कार्य कर रहे हैं!

डा कोवूर की पत्नी भी अपने पति के जैसे ही थीं, व अपने पति के कार्यों को पूर्ण समर्थन देती थीं! 1974 में उनकी पत्नी की म्रत्यु नें श्रीलंका में सनसनी फैला दी! वहां की संसद में उनकी म्रत्यु पर यह सन्देश पढ़ा गया,श्रीमती अक्का कोवूर, अपनी आत्मा या रूह को छोड़े बगैर चल बसीं, ताकि वहां के अन्धानुकरण करने वाले लोग फिकर में न पड़ें!  उनकी इच्छा के अनुसार उनके शरीर को श्रीलंका के कोलम्बो विश्वविद्यालय के मैडिसन विभाग में दे दिया गया! उनको जलने, दफ़नाने या फूलों से लादने की कोई रसम नहीं हुई!

50 सालों से भी ज्यादा समय तक अनेक योगी, ऋषि, सिद्ध पुरुष, ज्योतिषी, जादूटोने वाले एवं हस्त रेखा निपुणों से मिलने के बाद और भिन्नभिन्न प्रकार की आश्चर्यजनक घटनाओं और रहस्यपूर्ण व्यक्तियों के तथाकथित चमत्कारों का का बड़ी गहराई से विश्लेषण करने के बाद वे अपने बचपन में सिखाये गए बहुत से भ्रमों से बचनें में सफल हुए! ये ऐसे भ्रम होते हैं जो बचपन में उपदेश द्वारा बच्चों के दिमाग में भर दिए जाते हैं, और जिनसे इस समाज में रहते हुए बचा नहीं जा सकता! ये भ्रम भूतप्रेत, जादूटोने, देवताओं की नाराजगी, नर्क, राक्षस और श्राप आदि के बारे में होते हैं!  चमत्कारों  का  अन्वेषक  होने  के  कारण  डॉ कोवूर ने भोले भाले लोगों को भूतप्रेतज्योतिषजादू– टोना करने वाले,  हस्तरेखा देखने वालेकाले जादू व अन्य  अलौकिक शक्ति वालों से हमेशा बचाने की  कोशिश करते रहे! उनके अनुसार,“वे घटनाएं, वे सैकड़ों भूत घरों एवं प्रेत आत्माओं, जिन के बारे में मैंने खोज की, हर एक में मैंने किसी न किसी मनुष्य को ही इन आश्चर्यजनक घटनाओं को करने का जिम्मेदार पाया! ऐसे अजीबोगरीब काम वे या टो किसी मानसिक बीमारी के कारण या शरारत के कारण किया करते थे! मैंने बहुत से मानसिक रोगियों को, जिनमें प्रेत आता था, ठीक किया है! मैंने उनका इलाज उनमें से प्रेत निकालकर नहीं बल्कि उनको हिप्नोटाइज करके उनके दिमाग से गलत विचारों को दूर करके किया है! मेरा अनुभव है कि कुछ पुजारियों या साधुसंतों को संयोगवश जो सफलताएं मिलती हैं वे केवल पूजा, प्रार्थना या मन्त्रों का रोगी के मन के ऊपर हिप्नोटिक प्रभाव के कारण ही प्राप्त होती हैं! भोलेभले लोग इन इलाजों को भूतप्रेत और देवीदेवताओं के साथ जोड़ देते हैं!

हम में से लगभग हर व्यक्ति निम्नलिखित बातों में विश्वास करता है शुभ समय, लक्की नंबर, शगुन, बुरी नजर, बुरी जुबान, शुभ रंग, शुभ रत्न, जादूटोने, ज्योतिष, हस्तरेखा, अलौकिक शक्ति, प्रेतों का आना, प्रार्थनाओं की अलौकिक शक्तियां, पूजा, मंत्र, बलि, धार्मिक यात्राएं, देवताओं से भेंट, पवित्र राख, पवित्र आदमी, पवित्र स्थान, पवित्र वस्तु, पवित्र समय, टेलीपैथी एवं अन्य बहुत से वहम! डॉ कोवूर की खोज नें उन्हें इस सत्य से साक्षात्कार करवाया कि अन्धानुकरण करने वाले व्यक्तियों में से ऐसे वहम व विश्वासों की जड़ें रहस्यमयी व्यक्तियों ने अपनी आय के साधन को बनाने के लिए लगायी हैं! पूजा, प्रार्थना, भेंट और बलि का प्रभाव तो अन्धविश्वासी लोगों में मनोवैज्ञानिक ढंग से होता है! ये सारी बातें मनुष्य के दिमाग में नींद वाली दवाइयों जैसा प्रभाव डालती हैं! डॉ कोवूर के अनुसार ज्यादातर मानसिक बीमारियों का कारण तो देवताओं, शैतानों का अन्धानुकरण करने वाले लोगों में तथाकथित पवित्र वस्तुओं की अपवित्रता इत्यादि के बारे में पैदा किया डर ही होता है! डॉ कोवूर कहते हैं कि,   मैंने  अपनी  खोज  का  प्रचार  कार्य  सिर्फ  नौकरी  से  रिटायर  होने  के  उपरांत  ही  शुरू  किया  पहले  मैं  अपनी  खोजों  का  प्रचार  करने से  इसलिए  रुका  रहा  क्योंकि  अपनी  रोजी  रोटी  ऐसी  धार्मिक  संस्थाओं  में  कामकर  के  कमा  रहा था  जिनका  कार्य  ही  अन्धविश्वास  का प्रचार   करना   था!

डॉ कोवूर ने दो वर्षों तक हस्त रेखा विद्या व ज्योतिष विद्या सीखा, मगर इस पढाई ने उन्हें इसे व्यर्थ घोषित करनें में ही अधिक सहायता दी! उन्होंने अपने हर कार्य अशुभ दिनों व बुरे शगुनों के साथ शुरू किया! प्रेतों की तलाश में वे प्रेतघरों में सोये! वे और उनकी पत्नी, आधी रात को प्रेतों की खोज में कब्रिस्तान भी गए! उन्होंने कब्रिस्तान से श्रीलंका के रेडियो पर भी बोला! सिंहली, तमिल और अंग्रेजी समाचार पत्रों के माध्यम से उन्होंने तीन अवसरों पर जादूटोने वालों को इस बात की चुनौती दी कि वे उन्हें अपने जादूटोने से निश्चित समय में मार दे! तीनों ही अवसरों पर उन्हें डाक से बहुत से जादूटोने प्राप्त हुए, जिनमें कुछ चाँदी, तांबे की पत्तियों और कुछ कागज के थे! वे कहते हैं, “लंका के लगभग सभी भागों के तांत्रिकों द्वारा भेजे गए इन टोनों के बावजूद मैं आजतक बिलकुल तंदुरुस्त और ठीक हूँ, और जब अन्य मनुष्यों की तरह मर जाऊंगा तो ये टोने वाले यह अवश्य कहेंगे की मैं उनके टोनों के देर के प्रभाव के कारण मरा हूँ!

अंत में उन्होंने पाखंडियों के धोखे एवं गप्पों को इस चुनौती से नंगा किया कि वे अपने चमत्कारों को बिना धोखे वाली स्थितियों में करके दिखाएं और बदले में एक लाख रूपए ले जाएँ! आज से 70 साल पहले एक लाख रूपए की कीमत आज के 40 करोड़ रूपए से भी अधिक रही होगी! उन्होंने कहा,“मैं इनके खतरनाक परिणामों को भी जनता हूँ! यदि दुनिया में एक भी व्यक्ति अलौकिक शक्ति वाला हो, तो मुझे अपना बुढ़ापा अनाथालय में व्यतीत करना पड़ सकता है! मुझे पहले भी यकीन था, और अब भी यकीन है की मैं इन शर्तों में एक भी पैसा नहीं दूंगा, इसलिए मैं अपनी चुनौती को अपनी म्रत्यु तक खुला रख रहा हूँ!” 

डॉ कोवूर ने लोगों द्वारा बताई हुई बहुत सी भूतप्रेत व अलौकिक लगने वाली घटनाओं की पड़ताल की है और लोगों की समस्याएं सुलझाई हैं! उनके द्वारा सुलझाये गए कुछ केसों का वर्णन आगामी लेखों में किया जायेगा! आगामी लेखों में डॉ कोवूर के कुछ संस्मरण भी आयेंगे!