भ्रमात्मक अनुभव

किसी व्यक्ति का विश्वास उसके अपने प्रयोगों के आधार पर निर्मित होता है! क्या किसी व्यक्ति के ग्रहण किये अनुभव मात्र इसलिए छोड़ देना उचित है कि वह अनुभव आप प्राप्त नहीं कर सके? रात्रि में जब मैं आकाश में देखता हूँ, तो मुझे एक भी तारा नहीं दिखाई देता, क्योंकि मैं अंधा हूँ! मुझसे आगे वाली सीट पर बैठा व्यक्ति यदि आकाश में लाखों तारे देख लेता है, तो क्या यह उचित होगा की मैं मैं उसपर यह आरोप लगाऊं कि वह झूठ बोल रहा है? यदि कोई व्यक्ति दूरबीन से और भी अधिक दूर देख ले और मुझे उनके बारे में बताये तो क्या यह उचित होगा की मैं उसे एक कल्पना कह दूं? साधारण व्यक्ति में जोइलूइस या सैंडो की तरह शक्ति नहीं होती! इन शक्तिशाली व्यक्तियों में रामानुजन या आइन्स्टीन की तरह बुद्धि नहीं होती! यदि ऐसा है तो  क्या यह संभव नहीं है, कि कुछ व्यक्तियों में दूसरों की अपेक्षा अलौकिक एवं आध्यात्मिक अनुभव ज्यादा हों? मेरा यही विश्वास मुझे शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है! इसी तरह यदि दूसरे भी अपनी शांति व प्रसन्नता किसी और विश्वास में से प्राप्त करते हों तो मैं उनको ठेस पहुँचाने का प्रयत्न क्यों करूँ?

श्री के.पी. केशवा मैनन जो कि भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और बाद में श्रीलंका के भारतीय राजदूत भी थे, ने अपने 83वें जन्मदिवस के अवसर पर एक भारतीय पत्रिका के लिए लेख लिखा था, यह उसी का एक छोटा सा भाग है! श्री मैनन एक लेखक और पत्रकार भी थे! अपने बुढ़ापे में श्री मैनन जो भी लिखते थे, लाखों भारतीयों द्वारा उसे बड़ी उत्सुकता से पढ़ा जाता था, उनके शब्दों को बड़ा विद्वतापूर्ण समझा जाता था! श्री मैनन नें ऊपर जो कुछ भी लिखा है, बहुत से बुद्धिमान और विचारशील व्यक्तियों को यह एक मान्य दलील लगेगी! इसीलिए आइये अब हम मनोवैज्ञानिक ढंग से मनुष्य के विश्वास व मानसिक अनुभवों की जांच करें!

मनुष्य में अनुभव दो प्रकार के होते हैं, वास्तविक अनुभव और भ्रमात्मक अनुभव!

बहिर्मुखी अनुभव सत्य व वास्तविक होते हैं! तर्क व प्रयोगों द्वारा इनकी पड़ताल करके इनकी वास्तविकता का पता लगाया जा सकता है! जैसे दूरबीन या नंगी आखों से तारे देखना, इलेक्ट्रान का होना! अंतर्मुखी अनुभव सत्य तो हो सकते हैं, मगर आवश्यक नहीं कि वह वास्तविक भी हों! कई परिस्थितियों में तर्क व प्रयोगों द्वारा इनकी पड़ताल भी नहीं की जा सकती(यहाँ सत्य का अर्थ है कि कहने वाला अपनी पूरी जानकारी और समझ से सत्य बोल रहा है जबकि वास्तविक का अर्थ है उसके द्वारा बताई जा रही घटना वास्तव में घटित हुई है!)

उदाहरणतः एक छोटे बच्चे को नींद में बिस्तर पर मूत्र करने की बीमारी है! उसकी नासमझ माँ इस बात के लिए उसे रोज दण्डित करती हैं! इस घटना की वास्तविकता क्या है? यही कि जब लड़के का मूत्राशय भर जाता है तो उसके मस्तिष्क में इसकी सूचना पहुँचती है! यह सूचना बच्चे में एक सपना उत्पन्न करती है! बच्चा सपने में बिस्तर से उठकर मूत्रालय जाता है और वहां मूत्र त्यागता है! मगर असल में वह बिस्तर पर ही मूत्र त्याग देता है! यदि प्रातःकाल उठकर बच्चे के जागने से पूर्व ही उसका गीला बिस्तर बदलकर उसे सूखे बिस्तर पर सुला दिया जाये, तो जागने पर वह अपने बिस्तर को सूखा देखकर प्रसन्न हो जायेगा और अपनी माँ से उत्सुकतापूर्वक जाकर कहेगा, “माँ, आज रात में मैंने बिस्तर पर मूत्र नहीं किया, बाहर जाकर मूत्रालय में किया था!” बच्चा बिलकुल सत्य बोल रहा है, मगर यह वास्तविकता नहीं है! यह सत्य इसलिए है क्योंकि यह बच्चे का कल्पित अनुभव है! मगर जांच करने पर यह पता चल जायेगा कि उसने बिस्तर पर ही मूत्र त्यागा था!

भ्रमात्मक अनुभव तीन प्रकार के होते हैं—

. ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न भ्रम,. मानसिक भ्रम,. झूठे विश्वासों से उत्पन्न भ्रम

  1. ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न भ्रम : पांच ज्ञानेन्द्रियाँ होने के कारण यह भी पांच प्रकार के होते हैं– दिखाई देने वाले भ्रम, स्वाद वाले भ्रम, सुनने वाले भ्रम, स्पर्श वाले भ्रम व सूंघने वाले भ्रम! गर्मी के दिनों में सड़क पर पानी का दिखाई देना, रेगिस्तान की मरीचिका आदि द्रष्टि भ्रम हैं! आपने ध्यान दिया होगा, पक्की सड़क पर जाते हुए गर्मी के दिनों में दूर से पानी दिखाई देता है, मगर जैसे ही उसके पास जाओ वहां कोई पानी नहीं होता, अब पानी और दूर दिखाई देने लगता है! यह मात्र एक द्रष्टि भ्रम होता है, जिसके कारण को भौतिक विज्ञान के माध्यम से समझा जा सकता है! इसीप्रकार करौंदे के पत्ते को खाने के बाद पानी पीने से पानी मीठा लगता है, मीठा बिस्कुट खाने के बाद चाय मीठी नहीं लगती जबकि न तो पानी मीठा होता है न ही चाय फ़ीकी होती है, यह स्वाद भ्रम है!

बहुत से लोग जिन्हें भूतप्रेत, देवीदेवता या परियों आदि में विश्वास होता है, उनको अँधेरे में यह सब मात्र द्रष्टि भ्रम के कारण ही दिखाई पड़ते हैं! उस डर के कारण, जो इन लोगों के मन में बचपन में ही बैठा दिया जाता है, ये लोग पास जाकर उसकी जांच करने का साहस ही नहीं करते!

  1. मानसिक भ्रम : मानसिक भ्रम चार प्रकार के कारणों से उत्पन्न हो सकते हैं भौतिक, रासायनिक, जीव वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक!

भौतिक : आज विज्ञान के द्वारा मनुष्य में कृत्रिम भावनाएं उत्पन्न की जा सकती हैं! मतलब डर, भूख, नींद, प्रेम, उत्सुकता, ख़ुशी, दोस्ती या नफ़रत मात्र मस्तिष्क के किसी भाग को तरंगों के द्वारा उत्तेजित करके उत्पन्न किया जा सकता है! यही प्रक्रिया ढोलक की आवाज, तालियों की आवाज, संगीत और नृत्य, मंदिरों में पूजा, विभिन्न सभाओं इत्यादि के द्वारा भी संपन्न की जा सकती है! यह सभी क्रियाएं मस्तिष्क के तंत्र को उत्तेजित करती हैं, जिससे उसमें मानसिक भ्रम उत्पन्न होनें लगता हैं और वह व्यक्ति आवेशित हो जाता है!

रासायनिक : चरस, अफीम, धतूरा, गांजा, हेरोइन, L.S.D. जैसे पदार्थ मस्तिष्क को उत्तेजित करते हैं और व्यक्ति को मानसिक भ्रम उत्पन्न हो जाता है!  L.S.D. के खोजकर्ता अल्बर्ट हाफमैन (Albert Hofmann) ने L.S.D. की थोड़ी सी मात्रा लेने के उपरांत उसके शक्तिशाली प्रभाव के बारे में कुछ इस तरह बताया,…मामूली चक्कर और बेचैनी थी! मैं लेट गया और अत्यंत उत्तेजित काल्पनिक अवस्था में डूब गया! सपने जैसी स्थिति में बंद आँखों से मैं दिन के प्रकाश को स्पष्ट देख रहा था! मैं असाधारण आकार की तीव्र चमक और जल्दी जल्दी बदलते हुए रंगों वाली शानदार तस्वीर को लगातार  देख रहा था! लगभग दो घंटे बाद स्थिति सामान्य हो गयी! इन जैसे पदार्थो की बहुत ही सूक्ष्म मात्रा (एक मिलीग्राम का करोडवां हिस्सा) भी मानसिक उन्माद उत्पन्न करने के लिए काफी होता है! ऐसे रासायनिक पदार्थ मानसिक विकार वाले लोगों के खून में पाए जाते हैं! कभी कभी कुछ पुजारी नशीले पदार्थों को प्रसाद में मिला देते हैं, जिसे दर्शनार्थियों में धार्मिक उन्माद उत्पन्न हो जाता है! इसका एक उदाहरण मद्रास के मुथुमुदाली मोहल्ले में बालाजी का एक मंदिर है! 7 मई, 1963 को यहाँ के मुख्य पुजारी को 256 किलोग्राम गांजा रखने के अपराध में गिरफ्तार किया गया था! मुकदमें के दौरान पता चला कि यह पुजारी प्रसाद में गांजा मिलाया करता था, जिससे लोगों में धार्मिक उन्माद उत्पन्न किया जा सके!

जीव वैज्ञानिक : बेरीबेरी रोग विटामिन बी की कमी से होता है! पागलों जैसा आचरण इसका महत्वपूर्ण चिन्ह है! विटामिन की ही कमी के कारण उत्पन्न रोग पिलरागा मानसिक विकार का कारण बन सकता है! ऐसे व्यक्तियों को विटामिन की पूरी मात्र देकर पूर्व स्थिति में लाया जा सकता है! विटामिन की ही तरह शरीर में कुछ उत्पन्न होने वाले उत्तेजक रसों के असंतुलन से भी मानसिक विकार जन्म ले लेते हैं! वे व्यक्ति जिनमे पैराथायराइड ग्रंथि द्वारा पैदा किये गए रस की कमी होती है, भी गंभीर मानसिक भ्रम के शिकार हो जाते हैं! डॉ कोवूर एक बताते हैं, “मेरी एक भतीजी जब भी आकाश की तरफ देखती तो  उसे मेरी मृत माँ की आत्मा दिखाई देती! मैं उसे केरल के अपने पैतृक घर से श्रीलंका ले आया! पूरी तरह जांच करने पर पता चला कि उसकी पैराथाईराइड ग्रंथि में खराबी थी! इस खराबी को दूर करने के लिए उसे कैल्शियम दिया गया और इसके साथ ही उसे आकाश में मेरी माँ की आत्मा दिखाई देनी बंद हो गयी!

मनोवैज्ञानिक : मनोविज्ञान में एक माना हुआ सत्य है कि मानव मन पर सुझाव का प्रभाव होता है! यह सुझाव उसे नींद या अर्ध नींद में दिए जा सकते हैं! जैसे बहुत सारे मानसिक विकारों को हिप्नोटिज्म के द्वारा ठीक किया जा सकता है, उसी प्रकार नींद में सुझाव से भी बहुत से रोग ठीक किये जा सकते हैं! धार्मिक विश्वास एक धीमे व अनवरत चलने वाले हिप्नोटिज्म जैसे होते हैं! भूत से प्रभावित व्यक्तियों की तरह व्यव्हार और बदली हुई आवाज में बातें करने को मनोविज्ञान में ग्लोसोलालिआ (Glossolalia) कहा जाता है! पूजा और शैतानी नृत्य के दौरान मोहक मूर्छा, विश्वास, पूजा, प्रार्थना, धार्मिक यात्रा, आर्शीवाद, बलि, टोना, पवित्र पानी पीना इत्यादि सब बातें मात्र हिप्नोटिज्म से किसी व्यक्ति के मन पर सुझावों के अतिरिक्त कोई प्रभाव नहीं रखती! गहन समाधि स्वयं पर हिप्नोटिज्म का प्रभाव ही है! यह धीमी गति से चलने वाली प्रक्रिया है! समाधि के द्वारा व्यक्तियों के प्राप्त किये झूठे अनुभव हमेशा उसके धार्मिक भ्रमों के अनुसार ही होते हैं! एक ईसाई को समाधि के द्वारा ‘जीहोवा के दर्शन हो सकते हैं जो स्वर्ग में सोने के सिंहासन पर विराजमान है, उसके दायीं तरफ ईसा मसीह है, उसके चारो तरफ सुन्दर पंखों वाले देवता गीत गा रहे हैं! एक हिन्दू को समाधि के द्वारा ब्रह्मा के दर्शन हो सकते हैं जिनके तीन या पांच सिर है, जो कमल में विराजमान हैं! LSD, गांजा, अफ़ीम इत्यादि इस प्रकार के झूठे द्रश्य उत्पन्न कर सकते हैं! कुछ व्यक्ति गहरी समाधि के द्वारा क्रिप्टोम्नेशिया (Cryptomnesia) नाम की बीमारी के शिकार हो जाते हैं! इस बीमारी वाले व्यक्ति को पागलों जैसा यह विश्वास हो जाता है कि वह दैवीय शक्तियों वाला व्यक्ति है! अनपढ़ और भोले लोग जब मानसिक बीमारी के शिकार होते हैं, तो उन्हें पागल घोषित कर दिया जाता है! वहीँ अगर किसी बुद्धिमान और चालाक व्यक्ति को मानसिक बीमारी घेर ले तो वह अपने श्रोताओं या पाठकों को यह विश्वास दिला देता है कि उसमे ब्रह्मज्ञान, अंतिम सच्चाई और परमात्मा में लीन होने वाले गुण प्राप्त हो गए हैं! ऐसे व्यक्ति आम तौर पर किसी धर्म के प्रचारक या उसकी नींव डालने वाले बन जाते हैं!

  1. झूठे विश्वासों से उत्पन्न भ्रम : यह बचपन में धर्म के प्रति विश्वास पैदा करने के कारण होता है! भूतप्रेत, शैतान, परियां, फ़रिश्ते, ज्योतिष, श्राप, पवित्र जल, शुब समय, शुभ स्थान, शुम वस्तुए, शगुन, अपशगुन, स्वर्ग, नरक इत्यादि झूठे विश्वास हैं!

जैसा की श्री मैनन नें कहा है कि कुछ व्यक्ति अपने मन की प्रसन्नता दुसरे अन्धविश्वास से प्राप्त करते हैं, ठीक ऐसे ही परिणाम L.S.D., गांजा, अफीम का प्रयोग करके भी प्राप्त किये जा सकते हैं! परन्तु प्रश्न यह नहीं है कि किस तरह का प्रयोग शांति या प्रसन्नता प्रदान करता है, बल्कि प्रश्न तो यह है कि क्या यह सत्य है?


संदर्भ ग्रंथ: 1. अब्राहम कोवूर की पुस्तक “और देव पुरुष हार गए”, 2. विकिपीडिया

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पराविज्ञान पर वैज्ञानिक शोध व चुनौतियाँ

सन 1922 में ‘साइंटिफिक अमेरिकन‘ पत्रिका ने घोषणा की थी कि जो कोई भी जांच के दायरे में आकर १. आत्मा की फोटो लेगा या २. किसी भी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करेगा, उसे वह 2,500 US$ ईनाम के रूप में देगी! सबसे पहले जॉर्ज वालेंटीन की जांच की गयी, जिसे जाँच टीम के द्वारा धोखा करते हुए पकड़ लिया गया और वह ईनाम नहीं जीत पाए! तब से लेकर अभी तक दुनियाभर के पचासों व्यक्तियों और संगठनों नें इस प्रकार के ईनाम की घोषणा की, मगर आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं हुआ, जो किसी भी व्यक्ति या संगठन से ईनाम की रकम जीत सका हो! हालाँकि चुनौती हजारों लोग स्वीकार चुके हैं, मगर सब कुछ तय करने के बाद प्रदर्शन के समय उनमें से कई आते ही नहीं, कुछ अलग अलग प्रकार के बहाने बनाते हैं, कुछ जवाब ही नहीं देते, और कुछ धोखा करते हुए पकड़ लिए जाते हैं! मतलब इन 92 वर्षो में (सन 2014 तक) ऐसा एक भी बाशिंदा नहीं मिला जिसका दावा सच निकला हो! ऊपरी नजर से देखने में सीधे-सीधे यह बात सिद्ध हो जाती है कि जितने भी व्यक्ति ऐसा दावा करते हैं, वो सभी धोखा करते हैं, उनके पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं होती!

 जॉर्ज वालेंटीन (George Valiantine) सन 1920 के आसपास चर्चा में आये क्योंकि इन्होने दावा किया था कि एलिएंस धरती पर आते हैं और उनका हाक चीफ और कोकम (Hawk Chief and Kokum) नाम के देवदूतों (Spirit-Guides) से संपर्क है!

सन 1882 में United Kingdomमें Society for Psychical Research नाम से अपने प्रकार की संसार की पहली संस्था का जन्म हुआ, जिसका उद्देश्य विभिन्न प्रकार के अलौकिक चमत्कारों व परामनोवैज्ञानिक विषयों के सम्बन्ध में शोध करना था! यह संस्था आज भी सक्रिय है, इसके हजारों सदस्यों नें आजतक ढ़ेरों शोध किये हैं, और विभिन्न प्रकार के दावों की सच्चाई सामने लायी है जिसका निष्कर्ष है कि इन सभी घटनाओं के पीछे एक वैज्ञानिक कारण होता है, अलौकिक जैसी कोई भी चीज नहीं होती! इस संगठन की स्थापना के बाद इस विषय में शोध और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए समय-समय पर दुनियाभर में सैकड़ों संगठनों का जन्म हुआ! जिनमे से कुछ प्रमुख संगठनों के नाम इस प्रकार हैं

अमेरिका

  1. Center for Inquiry
  2. Committee for Skeptical Inquiry
  3. Independent Investigations Group
  4. James Randi Educational Foundation
  5. New England Skeptical Society
  6. The Skeptics Society

यूरोप

  1. Swedish Skeptics’ Association
  2. Hungarian Skeptical Society
  3. Irish Skeptics Society
  4. Italian Committee for the Investigation of Claims of the Paranormal
  5. Edinburgh Skeptics Society
  6. Merseyside Skeptics Society

भारत

  1. Federation of Indian Rationalist Associations
  2. Kerala Yukthivadi Sangham
  3. Maharashtra Andhashraddha Nirmoolan Samiti
  4. Science and Rationalists’ Association of India
  5. Dakshina Kannada Rationalist Association
  6. Tarksheel Society

अन्य

  1. Australian Skeptics
  2. Young Australian Skeptics
  3. Centre for Inquiry Canada
  4. New Zealand Skeptics
  5. Richard Dawkins Foundation for Reason and Science
  6. Brazilian society of skeptics and rationalists

पुनः ध्यान दें, इस सूची में सौ से अधिक संगठन हैं, यहाँ केवल कुछ महत्वपूर्ण संगठनों को नामांकित किया गया है! इन संगठनों का कार्य परामनोवैज्ञानिक विषयों पर शोध करना है! इन सभी के शोध का बस एक ही निष्कर्ष है, कि कुछ भी अलौकिक नहीं होता! हर घटना के पीछे एक कारण होता है, जिसकी व्याख्या वर्त्तमान वैज्ञानिक नियमों से की जा सकती है! तब भी कुछ साधूसन्यासी, ज्योतिषपण्डे और अलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले दुसरे लोग लोगों को झूठ बोलकर भ्रमित करते हैं और चालबाजी से उन्हें कुछ न कुछ ऐसा करके दिखा देते हैं जिससे लोगों को उनपर विश्वास हो जाता है! ऐसे लोग हमेशा इन संगठनों से बचने की कोशिश करते हैं! कई बार ऐसे लोगों को इन संगठनों के द्वारा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का न्यौता भी दिया जाता है, मगर ये कभी भी उसका जवाब तक नहीं देते!

लोगों को इन जैसे धूर्तों के चंगुल से बचाने के लिए इनमें से आधे संगठनों ने ईनाम की घोषणा भी की हुई है! उनके ईनाम की धनराशी इतनी अधिक है, की अगर एक भी आदमी जीत जाए तो उनका संगठन ही बंद हो जाए, मगर न ही आजतक कोई जीत सका है और न ही कोई जीत पायेगा, क्योंकि कोई चमत्कार होता ही नहीं है! ईनाम देनें वाले कुछ बड़े संगठनों की सूची इस प्रकार है

भारत में

  1. तर्कशील सोसाइटी, पंजाब : एक करोड़ रूपए
  2. पबीर घोष : पचीस लाख रूपए
  3. Humanist Rationalist Association, Godhra: 50 लाख रूपए यह सिद्ध करने पर कि भूत होते हैं! [TOI]

भारत से बाहर

  1. James Randi Educational Foundation : दस लाख अमेरिकी डॉलर
    Update: जेम्स रांडी के रेटायर हो जाने के कारण जेम्स रांडी फ़ाउंडेशन के बोर्ड ने इस चैलेंज को बंद करने का फ़ैसला लिया है। अब यह बोर्ड प्रतिवर्ष लगभग एक लाख डालर विश्व भर की उन संस्थाओं को दान में देगा जो अंधविश्वास को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
  2. Australian Skeptics : एक लाख आस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 50 लाख रूपए) [बीस हज़ार डॉलर उसे जो किसी का नाम घोषित करेगा तथा अस्सी हज़ार डॉलर उसे जो चुनौती पूरी करेगा. अगर किसी स्थिति में व्यक्ति अपना नाम खुद घोषित करता है, तो उसे ही पूरे एक लाख डॉलर मिलेंगे!] यह केवल आस्ट्रेलिया के नागरिकों के लिए ही है।
  3. Stuart Landsborough : 1,00,000 NZ$ (करीब 51 लाख रूपए)
  4. The Independent Investigations Group : 1,00,000 US$ (करीब 65 लाख रूपए) इसके अलावा उस व्यक्ति को 5000 US$ जो ऐसे किसी चमत्कारी व्यक्ति का पता बताएगा।
  5. Daniel Zepeda : 20,000 MX$ (करीब पांच लाख रूपए)
  6. Les Sceptiques du Québec : 10,000 CAD$ (करीब पांच लाख रूपए)
  7. Harry Houdini Prize : 1,000,000 RUB (क़रीब 12 लाख रुपए)

यहाँ सिर्फ दस संस्थानों के नाम और उनके द्वारा दी जाने वाली ईनाम की धनराशि लिखी गयी है! अगर आप उनकी चुनौती स्वीकार करना चाहें, तो उनके नाम पर क्लिक करके उनके घोषणा पृष्ठ पर पहुँच सकते हैं, मैंने सभी की डायरेक्ट लिंक लगा दी है! इसके अलावा अभी और भी कई सारे संस्थान हैं, मगर आप केवल इन दस से ही करीब तीन करोड़ रूपए कमा सकते हैं, यदि आपके पास एक भी अलौकिक शक्ति है! 

आप इतनी देर से सोंच रहे होंगे कि ईनाम तो ठीक है, मगर इसे जीता कैसे जाए? वैसे तो ये सभी पुरस्कार किसी भी एक ऐसे चमत्कार को दिखाकर प्राप्त किये जा सकते हैं, जिसमें कोई चालबाजी न की गयी हो, जो अलौकिक हो! मगर यदि आप या आपका कोई परिचित देव पुरुष, संत, योगी, सिद्ध गुरु, स्वामी या अन्य दुसरे जिन्होंने आत्मिक क्रिया कलापों से या परमात्मा की शक्ति से शक्ति प्राप्त की हो, वह निम्नलिखित में से किसी भी एक का प्रदर्शन करके ईनाम की रकम जीत सकते हैं-

  1. जो सील बंद करेंसी नोट का क्रमांक पढ़ सकता हो!
  2. जो किसी करेंसी नोट की ठीक नक़ल पैदा कर सकता हो!
  3. जो जलती हुई आग पर, अपने देवता के सहारे आधे मिनट से अधिक तक नंगे पैर खड़ा हो सकता हो!
  4. ऐसी वस्तु, जिसकी मांग की जाए, हवा से पैदा कर सकता हो!
  5. मानसिक शक्ति से किसी वस्तु को हिला या मोड़ सकता हो!
  6. टेलीपैथी के माध्यम से किसी दुसरे व्यक्ति के विचार पढ़ सकता हो!
  7. प्रार्थना, आत्मिक शक्ति, गंगा जल या पवित्र राख से अपने शरीर के किसी अंग को एक इंच बढ़ा सकता हो!
  8. जो योग शक्ति से हवा में उड़ सकता हो!
  9. जो योग शक्ति से पांच मिनट के लिए अपनी नब्ज रोंक सकता हो!
  10. पानी के ऊपर पैदल चल सकता हो!
  11. अपना शरीर एक स्थान पर छोड़कर दुसरे स्थान पर प्रकट कर सकता हो!
  12. योग शक्ति से अपनी श्वसन क्रिया तीस मिनट तक रोंक सकता हो!
  13. रचनात्मक बुद्धि का विकास करे! भक्ति या अज्ञात शक्ति से आत्म ज्ञान प्राप्त करे!
  14. पुनर्जन्म के कारण कोई अद्भुद भाषा बोल सकता हो!
  15. ऐसी आत्मा या प्रेत को पेश कर सके जिसकी फोटो ली जा सके!
  16. फोटो लेने के उपरांत फोटो से गायब हो सकता हो!
  17. किसी वस्तु का भर बढ़ा सकता हो!
  18. ताला लगे कमरे में से अलौकिक शक्ति से बाहर आ सकता हो!
  19. किसी छिपी हुई वस्तु को खोज सकता हो!
  20. पानी को शराब या पेट्रोल में परिवर्तित कर सकता हो!
  21. शराब को खून में परिवर्तित कर सकता हो!
  22. ज्योतिषियों के लिए विशेष : ऐसे ज्योतिषी एवं पण्डे जो यह कहकर लोगों को गुमराह करते हैं कि ज्योतिष और हस्त रेखा एक विज्ञान है, वह भी इस ईनाम को जीत सकते हैं अगर वे दस हस्त चित्रों या दस ज्योतिष पत्रिकाओं को देखकर आदमी और औरत की अलग अलग संख्या, जीवित और मृत लोगों की अलग अलग संख्या, और उन सभी के जन्म का ठीक समय व स्थान, अक्षांशरेखांश के साथ बात दें! इसमें पांच प्रतिशत की गलती माफ़ होगी!

उपरोक्त सभी 22 चुनौतियाँ डा. अब्राहम कोवूर नें सन 1963 में दी थीं, जिनमे से एक को भी पूरा करने वाले को वो बदले में एक लाख श्रीलंकन रूपए, जो उनकी जिंदगी भर की सारी कमाई थी, देने को तैयार थे! उनकी यह घोषणा उस समय दुनिया भर के सभी समाचार पत्रों में छपी थी! यह चुनौती उनकी म्रत्यु तक जारी रही, मगर कोई भी इसे जीत न सका! 1978 में उनकी म्रत्यु के बाद बसवा प्रेमानंद ने उनकी चुनौती को एक लाख भारतीय रूपए के रूप में चालू रखा! मगर 2009 में उनकी म्रत्यु भी हो गयी, मगर फिर भी इसे कोई न जीत सका! फिर दो वर्षो बाद अब्राहम कोवूर द्वारा श्रीलंका में स्थापित की गयी Sri Lanka Rationalist Association ने 2012 में उनकी चुनौती को दस लाख श्रीलंकन रूपए के ईनाम के साथ पुनः प्रारंभ कर दिया, जो कि अभी तक चल रही है! वहीँ दूसरी तरफ 1984 में मेघराज मित्र की अध्यक्षता में गठित ‘तर्कशील सोसाइटी, पंजाब‘ ने भी डा. कोवूर की चुनौती को अपने गठन के बाद से ही प्रारंभ रखा! ईनाम की रकम को बढ़ाते हुए आज 2014 में तर्कशील सोसाइटी ने इसे एक करोड़ रूपए तक बढ़ा दिया है! मगर आजतक कोई भी व्यक्ति इनमे से एक रूपए भी नहीं कमा पाया है!

इस पोस्ट की समाप्ति डॉ. कोवूर के ही कथन से करते हैं

“जो मनुष्य अपने चमत्कारों की पड़ताल करने की आज्ञा नहीं देता, धोखेबाज होता है! जिसमें चमत्कारों की पड़ताल करने का सहस नहीं होता, वह अन्धानुयायी होता है! जो बिना पड़ताल किये ही विश्वास कर लेता है, वह मूर्ख होता है!

प्रस्तावना

जब मैं छोटा थादेखता कि वे सभी लोग, जिन्हें मैं जनता था,  किसी संत या धार्मिक ग्रंथों और पुस्तकों में लिखी किसी भी बात को लेश मात्र भी शक द्रष्टि से नहीं देखते थे. उनकी कही या उनमें लिखी सभी बातों को बिना कोई तर्क किये ऐसे ही मान लेते थे. मेरे पढ़ेलिखे भाई भी इसके विपरीत नहीं थे. मेरे परिवार में मेरी मौसी जी ही भिन्न-भिन्न प्रकार के व्रत रखती थीं, जैसे हर सात दिन में ब्रहस्पति भगवान का व्रत, हर पंद्रह दिन में प्रदोष व्रत, हर शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत, और भी जितने व्रत बीच बीच में पड़ते रहते, वे सभी. प्रतिदिन अखबारों में निकला ही करता था कि आज अमुक पर्व है, आज के दिन व्रत रखने वालों को यह फल प्राप्त होता है, उनसे भगवान प्रसन्न होते हैं, और हमारे यहाँ उसका व्रत रख लिया जाता था! वह प्रतिदिन करीब एक घंटे से भी अधिक पूजा करती थीं. इसी प्रकार मेरी माँ भी थीं! पूरे क्षेत्र का वातावरण कुछ इस प्रकार का था कि उस व्यक्ति को सबसे अधिक सम्मान की द्रष्टि से देखा जाता था, जो जितना अधिक धर्मकर्म और पूजा-पाठ करता था! इसी माहौल में मेरा जन्म हुआ था. मुझमें भी यही संस्कार डाले गए थे. संस्कार स्वरुप मैं और भी अधिक धार्मिक प्रवृत्ति का हुआ! ईश्वर के प्रति गहरी आस्था तो थी ही, और जैसा कि बताया अधिक धार्मिक अधिक अच्छा माना जाता था, शायद इसलिए मैं इस ओर और अधिक आकर्षित हुआ.

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पृथ्वी को बचाते हुए वाराह भगवान

बचपन में वैसे भी कोई काम धंधा तो होता नहीं था, न ही स्कूल में कोई ज्यादा काम मिलता था, सो जो किताबें घर में दिखती, उन्हें ही पढ़ा करता! घर में धार्मिक पुस्तकों के अतिरिक्त और कुछ होता भी न था. इसी क्रम में एक पुस्तक ‘दशावतारपढ़ी थी. इसमें भगवन विष्णु के वाराह अवतार के सम्बन्ध में बताया गया था कि जब पृथ्वी किसी राक्षस के प्रभाव से समुद्र में डूब रही थी, तो विष्णु भगवान ने वाराह अवतार लेकर पृथ्वी को अपने दो बड़े दांतों से उठाकर उसे डूबने से बचाया था. किताब में इसका चित्र भी दर्शाया गया था. मैं तब काफी छोटा ही था, कक्षा 3 में ही था शायद, मगर टीवी, अख़बार इत्यादि से इतना जानने लगा था कि पृथ्वी कैसी है और खाली आकाश में कैसे बिना किसी सहारे के टिकी है! सो इन दोनों ही बातों का सच होना संभव नहीं था. समुद्र पृथ्वी के अन्दर है, फिर पृथ्वी समुद्र में कैसे डूब सकती हैयह विरोधाभाषी बातें थीं, और यही मेरे जीवन का पहला अनुभव था धर्मग्रंथों पर अविश्वास करने का!

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Alhazen

ग्यारहवीं शताब्दी में अरब के महान दार्शनिक और वैज्ञानिक इबेन अल्हेजेन (Ibn Al-Haytham or Alhazen) वो पहले इन्सान थे जिन्होंने गलती पकड़ने का तरीका इजात किया था. उन्होंने अपने शिष्यों से कहा था, सच को ढूंढना मुश्किल है और सच का रास्ता और भी मुश्किल. सच्चाई की खोज करने वाले को फैसला करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और न ही पहले की लिखी किताबों पर आँख मूंदकर यकीन करना चाहिए. उन किताबों में लिखी बातों को हर प्रकार से सवाल पूछकर जांचना चाहिए. सिर्फ तर्क और प्रयोगों में साबित बातों को ही मानना चाहिए, किसी की कही बातों को नहीं. एक बात हमेशा याद रखना चाहिए कि हर इन्सान गलतियों का पुतला होता है, और हम तो सच की खोज में निकले हैं. इसलिए हमें अपनी खोज के दौरान खुद अपने आप पर भी शक करना है और खुद से भी सवाल पूछना है ताकि हम लापरवाही और पूर्वाग्रह के शिकार न हो पायें. इस रास्ते पर चले तो सच्चाई तुम्हारे सामने होगी.”  ये तरीका विज्ञान का तरीका है, इतना ताकतवर कि आप अगर आज विदेश में बैठे मित्र से बात कर पाते हैं तो इस तरीके के कारण ही! इसने हमारी औसत उम्र दुगनी कर दी और रोबोट को सौरमंडल से बाहर भेज दिया!

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Abraham Kovoor

 

मगर इस तरीके को उपेक्षित करते हुए हमारे देश और विदेशों में भी अन्धानुकरण करने वाले लोगों की संख्या बहुतायत में पायी जाती है! ईमानदार आदमी अपनी दिनचर्या ईमानदारी के कार्यों से चलाता है और बेईमान आदमी मेहनत करने वालों के साथ धोखा करके. इस सूचि में प्रचारक, पादरी, संत, महंत, सिद्ध गुरु, स्वामी, योगी, ज्योतिषी  और पण्डे इत्यादि शामिल हैं, जो चमत्कार, योग शक्ति, जादूटोना, प्रेत, टेलीपैथी एवं धार्मिक पाखंडों से भोलेभाले लोगों को लूटते हैं. डॉ कोवूर के उम्रभर इसी विषय पर किये गए शोध का निष्कर्ष था कि जो भी लोग किसी अलौकिक शक्ति होने का दावा करते हैं, वे या तो धूर्त होते हैं या फिर मानसिक रोगी! डा कोवूर ने लगभग पचास वर्षों तक हर प्रकार के मानसिक, अर्धमानसिक एवं आत्मिक चमत्कारों की गहराई तक खोज की और अंत में इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि ऐसी बातों में लेश मात्र भी सत्य नहीं होता. इस संसार के मनोचिकित्सकों में डा कोवूर अकेले ऐसे आदमी थे, जिनको इस क्षेत्र में खोज करने के लिए पीएचडी की डिग्री प्राप्त हुई. भूतप्रेतों की खोज में वह भूत घरों में सोये और कब्रिस्तानों में उन्हें खोजने की कोशिश की. इन्होने अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण कार्य ‘अशुभ मौकोंपर शुरू किये. इन्होने अपने समय में एक लाख श्रीलंकन रुपये, जो की इनकी कुल संपत्ति थी, को भी दांव पर लगा दिया था. इन्होने चुनौती दी थी कि संसार का जो भी व्यक्ति बिना धोखे की स्थिति में कोई चमत्कार या अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करेगा, उसे वह एक लाख श्रीलंकन रुपये देंगे. यह चुनौती उनकी म्रत्यु तक जारी रही, मगर कोई भी इसे न जीत सका.

 

झूठ को लोगों तक पहुँचाने का सबसे बड़ा माध्यम है समाचार पत्र. इसमें हम कभी किसी के पुनर्जन्म की घटना पढ़ते हैं, तो कभी किसी किसी उलटे पैर वाली चुड़ैल की, कभी किसी की आत्मा शवदाह संस्कार के पहले पुनः शरीर में प्रवेश कर जाती है, तो कभी कोई आत्मा के साथ बात करने वाला मिल जाता है. चूकी यह सभी बातें समाचार पत्रों में छपती हैं इसलिए हम ज्यादा शक न करते हुए इसपर विश्वास कर लेते हैं. मगर वास्तव में अगर इनकी पड़ताल की जाती है, तो कई घटनाएं पूरी तरह से झूठ होती हैं, तो कई घटनाएँ किसी विशेष मकसद से प्रकाशित करवाई जाती हैं. कुछ घटनाओं में जिसकी खबर होती है, वो ही झूठी प्रतिष्ठा पाने के उद्देश्य से खुद कहानी गढ़ता है. इस ब्लॉग में इसी प्रकार की और भी ढेर सारी कहानियों का डी एन ए टेस्ट किया जायेगा. आपको उस कहानी के पीछे का असली कारण बताया जायेगा. हमारा प्रयास रहेगा कि इसमें हर प्रकार के अन्धविश्वास को शामिल किया जाए, और आपको तर्कशील बनाने में मदद की जाए!

 अनमोल